युवा शक्तिः डिस्ट्रैक्शन से डायरेक्शन तक
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युवा शक्तिः डिस्ट्रैक्शन से डायरेक्शन तक


आज के युवा बहुत ही सौभाग्यशाली हैं क्योंकि उन्हें इतिहास की सबसे इंटेलिजेंट, टैलेंटेड और कनेक्टेड पीढ़ी समझा जाता है। टेक्नोलॉजी, इंटरनेट और इंफॉर्मेशन ब्लास्ट ने सीखने और आगे बढ़ने के अनेक रास्ते खोल दिए हैं। वर्तमान समय का विद्यार्थी अपने मोबाइल फोन से दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन विश्वविद्यालय का लेक्चर्स देख सकता है। नई स्किल्स सीख सकता है और अपने सपनों को वैश्विक स्तर तक ले जा सकता है। लेकिन इसी आधुनिक युग में एक बहुत बड़ी समस्या तेज़ी से बढ़ी है और वह है मैसिव डिस्ट्रैक्शंस। लोग शारीरिक रुप से कम और मानसिक रुप से अधिक डिस्ट्रैक्टेड हैं। सोशल मीडिया के नोटिफिकेशंस, गेमिंग, एंडलेस स्क्रॉलिंग, वेब सीरीज़, बेवजह घूमना-फिरना, गलत कंपनी और एंटरटेनमेंट की अपार सुविधाओं ने फोकस को कमज़ोर कर दिया है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि डिस्ट्रैक्शंस अब सामान्य लगने लगे हैं। लोग घंटो स्क्रीन पर समय बर्बाद कर के भी यह महसूस नहीं करते कि उनका कितना समय, एनर्जी और मेंटल पावर बर्बाद हो चुकी है।

वास्तविक समस्या केवल समय बर्बाद होना नहीं है बल्कि डिस्ट्रैक्शंस इंसान की कॉन्संट्रेशन पॉवर को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। रिसर्च बताती है कि जब किसी काम के बीच फोन नोटिफिकेशन आती है तो फोकस टूट जाता है और उसी कॉन्सन्ट्रेशन लेवल पर आने में लगभग 20-30 मिनट लग सकते हैं। अगर एक दिन में ऐसा 10-15 बार हो, तो इंसान का आधा प्रोडक्टिव दिन बिना महसूस किए ही खत्म हो जाता है। यही कारण है कि आज फोकस मैनेजमेंट, इंटेलिजेंस से भी ज़्यादा ज़रुरी बन चुका है। कई बार सामान्य इंटेलिजेंस वाला वह स्टूडेंट जो लगातार अनुशासन और फोकस के साथ काम करता है, इंटेलिजेंट लेकिन डिस्ट्रैक्टेड स्टूडेंस से ज्यादा परफॉर्मेंस देता है।

हालांकि वर्तमान समय के युवाओं में एक बहुत बड़ी ताकत भी मौजूद है और वह है एडजस्ट एंड इवॉल्व करने की ताकत। आजकल के युवा तेज़ी से नई चीज़ें सीख सकते हैं, टेक्नोलॉजी को अपनाते हैं और बदलते माहौल में खुद को ढाल सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि बहुत से लोग यह समझ नहीं पाते कि कब, कहां और कितना एडजस्ट करना है। कई बार लड़के ट्रेंड्स और सोशल प्रेशर के पीछे अपनी प्रतिभा और विशेषता खो देते हैं। इसलिए नई चीज़ों को अपनाने के लिए केवल मनोरंजन और ट्रेंड्स की तरफ नहीं बल्कि सेल्फ डेवलपमेंट, डिस्पलिन, एजुकेशन, कैरेक्टर बिल्डिंग और प्रोडक्टिव गोल्स की तरह इस्तेमाल करना ज़रुरी है।

वर्तमान समय में मनोरंजन की भाषा बदल चुकी है। बहुत से लोग एंजॉयमेंट को केवल मनोरंजन, आउटिंग्स, शॉपिंग, पार्टीज़ और सोशल मीडिया एंगेजमेंट से जोड़ते हैं। थोड़े समय के लिए यह एक्टिविटीज़ आपको अच्छा महसूस करा सकती है लेकिन लॉन्ग टर्म सैटिस्फैक्शन नहीं दे सकती। वास्तविक खुशी तब मिलती है जब व्यक्ति कुछ उद्देश्यपूर्ण उपलब्धि हासिल करता है, स्वयं को बेहतर बनाता है और अपने परिवार को गर्व महसूस कराता है और अपनी विशेषता को सही डायरेक्शन में इस्तेमाल करता है। यदि युवा लाभ वाले कामों को मनोरंजन के रुप में प्रयोग करना सीख लें जैसे रीडिंग, एक्सरसाइज़, लर्निंग, स्किल डेवलपमेंट, क्रिएटिविटी और दूसरों की मदद करना तो प्रोडक्टिविटी और एंजॉयमेंट दोनों साथ चल सकते हैं।

लोग समझते हैं कि टेक्नोलॉजी समस्या है लेकिन समस्या टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि उसका अनियंत्रित इस्तेमाल है। स्मार्टफोन नॉलेज का सबसे पॉवरफुल सोर्स भी बन सकता है और डिस्ट्रैक्शन का सबसे बड़ा कारण भी। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि इंसान टेक्नोलॉजी को कंट्रोल कर रहा है या टेक्नोलॉजी इंसान को। इसके लिए डिजिटल अनुशासन बहुत ज़रुरी है। सुबह उठते ही फोन चेक करने की आदत, हर कुछ मिनट में नोटिफिकेशंस देखना, लेट नाइट स्क्रॉलिंग और बिना ज़रुरत सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना फोकस और मेंटल पीस दोनों को कमज़ोर करता है। प्रोडक्टिव युवा वह है जो टेक्नोलॉजी को टूल की तरह इस्तेमाल करे, एडिक्शन की तरह नहीं।

युवाओं की पर्सनैलिटी पर संगत का भी बहुत गहरा असर पड़ता है। इंसान जिन लोगों के साथ ज़्यादा समय बिताता है, धीरे-धीरे वैसा ही सोचने लगता है। अगर संगत नकारात्मक, बिना किसी उद्देश्य वाली और टाइमपास मानसिकता वाली हो तो उसका असर भविष्य पर भी पड़ता है। वहीं अनुशासित, मेहनती और लक्ष्य का पीछा करने वाले लोगों के साथ रहने से इंसान खुद भी मोटिवेट होता है और दूसरों को भी करता है। इसलिए दोस्ती और माहौल का चुनाव बहुत सोच समझकर करना चाहिए।

एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि सफलता केवल मोटिवेशन से नहीं मिलती। मोटिवेशन टेम्पररी होता है, कुछ दिनों तक इंसान बहुत मोटिवेटेड महसूस कर सकता है लेकिन फिर धीरे धीरे आलसीपन और डिस्ट्रैक्शंस वापस आ जाते हैं। ऐसे समय में अनुशासन काम आता है। सफल व्यक्ति मूड के हिसाब से नहीं बल्कि नियम के हिसाब से काम करते हैं। वे बोरिंग समय में भी कंसिस्टेंसी बनाए रखते हैं। यही कंसिस्टेंसी धीरे-धीरे असाधारण सफलता की ओर ले जाती है। 

प्रोडक्टिव लाइफ के लिए सेहत भी उतनी ही ज़रुरी है जितनी प्लानिंग और मेहनत। अगर नींद पर्याप्त नहीं होगी, खाना पौष्टिक नहीं होगा और शारीरिक गतिविधि शून्य होगी तो फोकस और एनर्जी दोनों कमज़ोर हो जाएंगे। स्वस्थ्य शरीर ही फोकस करने की नींव है। रोज़ाना सैर, एक्सरसाइज़, संतुलित खाना और पर्याप्त आराम ना केवल सेहतमंद आदत है बल्कि प्रोडक्टिविटी हैबिट्स भी है।

वर्तमान समय में सोशल मीडिया ने भी लोगों को मानसिक रुप से परेशान कर रखा है। लोग दूसरों की सफलता देखकर स्वयं को कम समझने लगते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हर व्यक्ति का अपना संघर्ष होता है। किसी को सफलता जल्दी मिलती है तो किसी को देर से। इसलिए दूसरों से अपनी तुलना नहीं बल्कि स्वयं से तुलना होनी चाहिए। अगर इंसान हर दिन थोड़ा बेहतर बन रहा है तो वही वास्तविक प्रगति है।

वर्तमान समय की प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में मात्र डिग्री पर्याप्त नहीं है। स्किल्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कम्युनिकेशन स्किल्स, लीडरशिप, टाइम मैनेजमेंट, पब्लिक स्पीकिंग, डिजिटल लिटरेसी और प्रॉब्लम-सॉल्विंग जैसी एबिलिटीज़ युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करती है। प्रोडक्टिव युवा वह है जो लंबे समय तक सीखने वाला बना रहे और स्वयं को अपग्रेड करता रहे। जीवन में असफलताएं भी आती हैं। परीक्षा में फेल होना, रिजेक्शन, आर्थिक संकट या खुद से की हुई गलितयां लोगों का आत्मविश्वास तोड़ देती हैं। लेकिन असफलता का मतलब समाप्त होना नहीं होता। असफलता व्यक्ति को बेहतर होने का अवसर देती है। दुनिया के कई सफल लोग शुरुआत में फेलियर्स का सामना कर चुके हैं। अंतर केवल इतना था कि उन्होंने प्रयास करना नहीं छोड़ा।

प्रोडक्टिविटी का मतलब केवल पैसा कमाना नहीं है। वास्तविक सफलता संतुलित जीवन है, जहां करियर के साथ कैरेक्टर, सेहत, परिवार, अध्यात्मिकता और सामाजिक कर्तव्य भी शामिल हों। व्यक्ति की प्रगति केवल उसकी जिंदगी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसके ज्ञान, सफलता और मेहनत से परिवार, समाज एवं अन्य लोगों को भी फायदा पहुंचना चाहिए।

सुबह का समय प्रोडक्टिविटी के लिए सबसे पॉवरफुल माना जाता है। नींद के बाद दिमाग सबसे ज़्यादा फ्रेश और फोकस्ड होता है। इसलिए सुबह के पहले 90 मिनट्स को सेल्फ डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद हो सकता है। प्रेयर, रीडिंग, प्लानिग, एक्सरसाइज़ और डीप वर्क जैसी एक्टिविटीज़ पूरे दिन का डायरेक्शन सेट कर देती हैं। इसके साथ डेली टाइम ऑडिट भी ज़रुरी है। अगर दिन समाप्त होने पर इंसान को यह याद ही ना रहे कि उसने समय कहां बिताया, तो यह स्पष्ट संकेत है कि बहुत सारा समय अनकॉशंस डिस्ट्रैक्शन में चला गया।

अंत में सबसे बड़ी बात यह है कि बदलाव किसी भी उम्र में शुरु किया जा सकता है। चाहे कोई 15 साल का हो या 40 साल का। अगर उसे यह एहसास हो जाए कि उसकी ज़िंदगी डिस्ट्रैक्शंस में जा रही है, तो वह उसी पल से नई शुरुआत कर सकता है। जब जागो तभी सवेरा केवल एक कहावत नहीं, बल्कि प्रोडक्टिव जीवन का पॉवरफुल प्रिसिंपल है। आज का युवा कमज़ोर नहीं है, बल्कि डिस्ट्रैक्टेड है। उसके पास एनर्जी भी है, इंटेलिजेंस भी और अवसर भी। आवश्यकता केवल इस बात की है कि वह अपने फोकस को प्रोडक्ट करे, अपने समय की कीमत समझे और अपनी एनर्जी को किसी उद्देश्पूर्ण काम के लिए इस्तेमाल करे। क्योंकि प्रोडक्टिव युवा केवल अपना भविष्य नहीं बदलता – वह पूरी सोसाइटी का भविष्य बदल सकता है।  


डॉ. आयशा बदर

About Writer: एसोसिएट प्रोफेसर, राजस्थान

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