“भीड़ में रहने वाला इंसान आज इतना अकेला क्यों है?”
बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाने वाला इंसान भीतर ही भीतर टूट रहा होता है। मोबाइल की स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे, कामयाबी की चमक और व्यस्त दिनचर्या के पीछे एक ऐसी ख़ामोशी छिपी है जिसे अक्सर कोई सुन नहीं पाता। बहुत से लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में चिंता, बेचैनी, थकावट और निराशा महसूस करते हैं। यही भावनाएँ जब लंबे समय तक बनी रहें, तो तनाव (स्ट्रेस), चिंता (एंग्जायटी) और अवसाद (डिप्रेशन) का रूप ले सकती हैं।
आज डिप्रेशन पूरी दुनिया में एक गंभीर समस्या बन चुका है। Our World in Data के एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया की लगभग 3.4% आबादी, यानी लगभग 264 मिलियन लोग डिप्रेशन से प्रभावित हैं। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। 2015 के NHMS सर्वे के अनुसार, हर 20 भारतीयों में से एक व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी डिप्रेशन से जूझ चुका है, जबकि 2.7% लोग सर्वे के समय सक्रिय रूप से इससे प्रभावित थे।
डिप्रेशन के लक्षण
हर इंसान कभी न कभी दुखी या निराश महसूस करता है, लेकिन अगर ये भावनाएँ लंबे समय तक बनी रहें और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगें, तो यह डिप्रेशन का संकेत हो सकता है। इसके कुछ आम लक्षण हैं—हर समय निराश या लाचार महसूस करना, रोज़मर्रा के कामों में दिलचस्पी कम हो जाना, नींद की कमी या बहुत ज़्यादा सोना, छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन या गुस्सा आना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, याददाश्त कमज़ोर होना और कभी-कभी आत्महत्या या मौत के विचार आना। ये सभी लक्षण इंसान की जीवन-गुणवत्ता पर गहरा असर डालते हैं, इसलिए इन्हें गंभीरता से लेना ज़रूरी है।
डिप्रेशन के कारण: सिर्फ़ मानसिक नहीं, सामाजिक भी
डिप्रेशन के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण हो सकते हैं। मस्तिष्क के रसायनों का असंतुलन, डिप्रेशन की पारिवारिक पृष्ठभूमि, हार्मोनल परिवर्तन, किसी अपने की मृत्यु, तलाक, नौकरी छूटना, आर्थिक संकट, बचपन के कड़वे अनुभव, अकेलापन और सामाजिक सहारे की कमी—ये सब इंसान को मानसिक रूप से कमज़ोर बना सकते हैं। शराब या नशीली चीज़ों का इस्तेमाल भी स्थिति को और बिगाड़ देता है।
लेकिन आज डिप्रेशन का एक गहरा कारण अर्थहीनता की भावना भी है। खासकर पढ़े-लिखे, संवेदनशील और बुद्धिमान लोगों में यह सोच बढ़ रही है कि ज़िंदगी का कोई बड़ा उद्देश्य नहीं है। जब इंसान यह मानने लगे कि “मेरा स्वयं ही सब कुछ है, न मुझे किसी की ज़रूरत है, न किसी को मेरी,” तो किसी बड़े नुकसान या भावनात्मक झटके के बाद उसे लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया।
इसके विपरीत, अगर इंसान यह महसूस करे कि वह एक बड़े समाज और मानवता का हिस्सा है, तो कठिन परिस्थितियों में भी उसके भीतर उम्मीद बाकी रहती है। उसे लगता है कि मुसीबत के समय वह अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
इस्लाम: इंसान को सहारा देने वाला निज़ाम
इस्लाम ने इंसान और समाज में इसी सामूहिक भावना को पैदा करने पर बहुत ज़ोर दिया है। इस्लाम इंसान को एक बड़े समुदाय का हिस्सा बताता है और पूरी इंसानियत को एक परिवार की तरह देखता है:
“ऐ इंसानों! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें जातियों और क़बीलों में इसलिए बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।”
कुरआन यह भी कहता है:
“जिसने एक इंसान की जान बचाई, उसने मानो पूरी इंसानियत को जीवन दिया।”
इसी तरह कठिन परिस्थितियों में ज़रूरतमंदों, अनाथों और मुसीबत में घिरे लोगों की मदद को नेक काम बताया गया है।
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने पड़ोसी के हक़ पर बहुत ज़ोर दिया। अगर पड़ोसी मदद माँगे तो उसकी मदद करो, बीमार हो तो उससे मिलने जाओ, मुसीबत में हो तो उसका साथ दो। इस्लाम ने ज़कात का ऐसा सिस्टम बनाया जिसका एक उद्देश्य कर्ज़ और आर्थिक तंगी में फँसे लोगों को राहत देना भी था, क्योंकि आर्थिक दबाव कई बार डिप्रेशन और आत्महत्या तक की वजह बन जाता है।
इस्लाम इंसानों को एक शरीर की तरह बताता है—अगर शरीर के किसी हिस्से में दर्द हो, तो पूरा शरीर उसे महसूस करे। यानी ऐसा समाज बनाया जाए जहाँ कोई इंसान मुसीबत में अकेला महसूस न करे। डिप्रेशन से बचाव के लिए यह एक बहुत मज़बूत सामाजिक व्यवस्था है।
सोशल मीडिया: जुड़ाव या अकेलेपन का नया चेहरा?
भारत में, खासकर युवाओं के बीच, मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल डिप्रेशन, चिंता और तनाव को बढ़ा रहा है। अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल आत्म-सम्मान में कमी, नींद की खराबी, साइबर-धमकी और दूसरों से तुलना की भावना को बढ़ाता है।
आज यह आम आदत बन गई है कि लोग अपनी निजी ज़िंदगी की हर खुशी सोशल मीडिया पर साझा करना चाहते हैं और बदले में “लाइक्स” और प्रतिक्रियाओं की उम्मीद रखते हैं। अगर प्रतिक्रिया उम्मीद के मुताबिक न मिले, तो निराशा होती है। दूसरी ओर, दूसरों की चमकदार ज़िंदगी देखकर इंसान खुद को कमतर महसूस करने लगता है।
कोई नई ड्रेस पहने, स्वादिष्ट खाना बनाए या किसी खूबसूरत जगह घूमने जाए—वह तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है। फिर धीरे-धीरे वह अपनी नज़र से नहीं, बल्कि दूसरों की नज़रों से खुद को देखने लगता है। यही तुलना आत्मविश्वास को कम कर देती है और अकेलेपन को बढ़ाती है।
देर रात तक फ़ोन का इस्तेमाल, बहुत ज़्यादा स्क्रीन टाइम और आमने-सामने की मुलाक़ातों में कमी भी मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है।
डिप्रेशन का इलाज: बेहतर ज़िंदगी की ओर कदम
डिप्रेशन का इलाज संभव है। डॉक्टर की सलाह से दवाएँ, मनोचिकित्सा (काउंसलिंग), संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और सकारात्मक गतिविधियाँ इसमें मददगार हो सकती हैं।
लेकिन इलाज का एक पहलू और भी है—अपने दिमाग को दिल के पास रखना।
दिल इच्छाओं और ख्वाहिशों की फैक्ट्री है। इंसान ऐसी इच्छाएँ पाल लेता है जो इस दुनिया में हमेशा पूरी नहीं हो सकतीं। ग़ालिब ने कहा था:
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
जब इच्छाएँ इंसान की क्षमता से बहुत आगे निकल जाती हैं और पूरी नहीं होतीं, तो निराशा बढ़ने लगती है। बड़े लक्ष्य रखना अच्छी बात है, लेकिन अत्यधिक महत्वाकांक्षा कई बार दुख का कारण बन जाती है। इंसान को बड़े सपने देखने चाहिए, मगर उन्हें अक्ल के तराज़ू में भी तौलना चाहिए। इस दुनिया में हर सपना पूरा नहीं होता।
अल्लामा इक़बाल ने कहा था:
“अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल,
लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे।”
यानी सामान्य परिस्थितियों में इंसान के फैसले सोच-समझकर होने चाहिए।
सुनना भी इलाज है
मेरे विचार में, डिप्रेशन का एक बड़ा कारण यह भी है कि इंसान के दुख, दर्द, शिकायतें और डर सुनने वाला कोई नहीं होता। बहुत से लोग अपनी भावनाएँ किसी के साथ साझा नहीं कर पाते। कभी उनके पास रिश्तों के लिए समय नहीं होता, तो कभी भरोसे की कमी होती है।
नतीजा यह होता है कि भावनाएँ भीतर जमा होती रहती हैं और एक दिन इंसान भीतर से टूट जाता है।
इस्लाम ने इस बात पर बहुत ज़ोर दिया कि अगर कोई अपनी बात किसी से साझा करे, तो उसकी बात को राज़ रखा जाए और उसकी बात ध्यान से सुनी जाए। पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) की ज़िंदगी इसका सुंदर उदाहरण है। एक मानसिक रूप से परेशान महिला जब अपनी बात कहने आई, तो आपने अपनी व्यस्तता के बावजूद उसकी पूरी बात धैर्य से सुनी। यह समाज के लिए एक मिसाल है कि कमज़ोर और दुखी लोगों की बात सुनना कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है।
निष्कर्ष
यह समझना ज़रूरी है कि इंसान केवल शरीर नहीं, बल्कि शरीर और आत्मा—दोनों का मेल है। उसे दवा, दुआ, रिश्ते और सहारा—सबकी ज़रूरत होती है। केवल धार्मिक विश्वास या केवल भौतिक साधन, दोनों में से कोई एक पर्याप्त नहीं है।
हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ कोई इंसान अपनी तकलीफ़ में अकेला महसूस न करे, जहाँ लोग एक-दूसरे की बात सुनें और सहारा बनें। क्योंकि कई बार किसी की ज़िंदगी बदलने के लिए बड़े समाधान नहीं, बल्कि थोड़ा समय, एक भरोसेमंद रिश्ता और ध्यान से सुनी गई कुछ बातें ही काफ़ी होती हैं।
सुमैया मरयम
सोशल एक्टिविस्ट, नई दिल्ली