ग्लोबल वार्मिंग- एक गंभीर चुनौती
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कवर स्टोरी

ग्लोबल वार्मिंग- एक गंभीर चुनौती


आज जब गर्मियों में पंखे भी राहत देने से इनकार कर रहे हैं, समुद्र अपनी हदें तोड़कर बस्तियों में दाखिल हो रहे हैं, और बाढ़ उन इलाकों में भी आने लगी है जहाँ पहले कभी नहीं आती थीं, तब यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आख़िर हमारी धरती को क्या हो रहा है? यह केवल इत्तेफ़ाक नहीं, यह कोई अस्थायी परिवर्तन भी नहीं बल्कि यह उस गहरे और संगीन संकट की आवाज़ है जिसे दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जानती है।

ग्लोबल वार्मिंग, यानी पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में होने वाली यह दीर्घकालिक वृद्धि (long term growth), आज के समय की सबसे गंभीर और जटिल समस्याओं में से एक बन चुकी है। अगर इसकी जड़ों को खोजने का प्रयास करें, तो हमें इतिहास के उस दौर में लौटना होगा जब दुनिया ने औद्योगिक क्रांति का स्वागत किया था, एक ऐसा युग जिसने मानवता के लिए तरक्की की नई राहें दिखाईं, लेकिन साथ ही प्रकृति के साथ एक अनकहा समझौता भी तोड़ा। 

उस दौर से लेकर आज तक, मनुष्य ने जो भी विकास और नवाचार (innovations) किए चाहे वो कारख़ाने हों, वाहन हों, या ऊर्जा के नए स्रोत, वे सब मिलकर ग्लोबल वार्मिंग को एक ऐसी स्थायी समस्या में बदलते चले गए, जिससे पीछा छुड़ाना अब आसान नहीं रहा। पिछले 100 सालों में पृथ्वी की औसत सतह का तापमान लगभग 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है- (IPCC Report)। यह आँकड़ा भले ही छोटा लगे, लेकिन इसके नतीजे बेहद व्यापक और ख़तरनाक हैं।

यह बात भी सच है कि पृथ्वी की जलवायु कोई स्थिर चीज़ नहीं रही। हज़ारों-लाखों सालों से यह बदलती रही है, कभी सूरज की गतिविधियों के चलते, कभी ज्वालामुखियों के विस्फोट से उठे धुएँ और राख के कारण। प्रकृति का अपना एक चक्र है, अपनी एक लय है। लेकिन जो बदलाव आज हम देख रहे हैं, वह उस प्राकृतिक लय से बिल्कुल अलग है। 

यह बदलाव न तो धीमा है और न ही किसी प्राकृतिक घटना का नतीजा, बल्कि इसके पीछे स्पष्ट रुप से वे ग्रीनहाउस गैसें हैं जो दशकों से हमारे वायुमंडल में लगातार घुलती जा रही हैं। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और दूसरी गैसों की यह परत धरती की गर्मी को बाहर निकलने से रोकती है, और इस तरह तापमान का यह बढ़ता सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता।

 वायुमंडलीय कारण -ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) 

ग्लोबल वार्मिंग के पीछे जो सबसे बड़ा वायुमंडलीय कारण है, वह है 'ग्रीनहाउस प्रभाव'। सामान्य परिस्थितियों में पृथ्वी सूरज से आने वाले विकिरण (radiations) को अवशोषित करती है और उसकी अतिरिक्त गर्मी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित (reflected) कर देती है। यह एक संतुलन है, एक प्राकृतिक व्यवस्था जो सदियों से चली आ रही थी। लेकिन इस संतुलन को बिगाड़ने में इंसान ने कोई कसर नहीं छोड़ी। 

औद्योगिक विकास, रासायनिक संयंत्र, वाहनों का धुआँ, इन सबने वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को बेतहाशा बढ़ा दिया। इसमें एक और अध्याय जुड़ता है और वो है 'युद्धों का इतिहास' जिसमें टनों विस्फोटकों, रासायनिक हथियारों, WMD और परमाणु परीक्षणों की वह अंधी दौड़, जिसने न केवल ज़मीन को बल्कि हवा को भी ज़हरीला बना दिया है। 2024 में कोयले, तेल और गैस से निकलने वाला कार्बन उत्सर्जन अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया (Climate Central, 2024)। 

इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि वायुमंडल में गैसों की एक ऐसी मोटी परत बन गई जो किसी कंबल की तरह धरती को लपेटे हुए है और जो गर्मी पहले आसानी से अंतरिक्ष में लौट जाती थी, वह अब इस परत से टकराकर वापस धरती पर आ जाती है।

 अन्य प्रमुख कारण 

ग्लोबल वार्मिंग के लिए केवल औद्योगिक धुआँ या वाहनों का उत्सर्जन ही ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि इसके कई और कारण हैं जो अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं।

सबसे पहले बात करें जंगलों की, पेड़ प्रकृति का वह अनमोल तोहफा हैं जो कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर हवा को साफ़ रखते हैं। उष्णकटिबंधीय वनों(tropical forest) की कटाई अकेले ही कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 20% हिस्सा है-(GSC Advanced Research, 2024)। हर बार एक पेड़ गिरता है तो प्रकृति का एक रक्षक कम हो जाता है। यह सिर्फ़ किसी दूर देश की कहानी नहीं बल्कि यह हमारे अपने शहरों का हाल है। 

हाल ही में भोपाल जैसे शहर में 70 साल पुराने पेड़ काट दिए गए और उनकी जगह नए पौधे लगाए गए जो छाया देने में अभी 20 साल और लेंगे। यानी आने वाली दो दशक तक वहाँ के लोग भीषण गर्मी में बेछाँव तपते रहेंगे और यह सब किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि इंसानी फ़ैसलों की वजह से हो रहा है।

पशुपालन भी एक बड़ा कारण है जिस पर बहुत कम चर्चा होती है। एक मीथेन अणु कार्बन डाइऑक्साइड से 20 गुना अधिक गर्मी रोकने में सक्षम है और पिछले दो दशकों में मानव-जनित मीथेन (anthropogenic methane) उत्सर्जन में 20% की वृद्धि हो चुकी है, जिसमें सबसे तेज़ बढ़ोतरी पिछले पाँच सालों में दर्ज की गई है-(ESA Global Methane Budget, 2024)

खेतों में इस्तेमाल होने वाली खाद से निकलने वाली नाइट्रस ऑक्साइड भी कम ख़तरनाक नहीं। GSC Advanced Research, 2024) बताती है कि यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड से 300 गुना अधिक प्रभावी ढंग से गर्मी रोकती है और ग़लत कचरा निपटाने से लैंडफिल में सड़ता हुआ कचरा,मीथेन और दूसरी हानिकारक गैसें सीधे वायुमंडल में छोड़ता रहता है।

 इस्लाम की भूमिका 

जब हम ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection) की बात करते हैं, तो अक्सर यह बहस विज्ञान और राजनीति तक सिमट जाती है। लेकिन इस्लाम ने सदियों पहले ही प्रकृति के साथ इंसान के रिश्ते को बड़े स्पष्ट और गहरे शब्दों में परिभाषित कर दिया था।

पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया-"पानी बर्बाद मत करो, भले ही तुम बहती नदी के किनारे हो।"(इब्न माजा)। यह सिर्फ़ एक धार्मिक निर्देश नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच है जो संसाधनों (resources) के प्रति सचेत और संयमित रवैये की बात करती है। 

पेड़-पौधों के बारे में उन्होंने कहा- "अगर कोई मुसलमान पेड़ लगाता है या बीज बोता है, और फिर कोई पक्षी, इंसान या जानवर उसे खाता है, तो यह उसके लिए सदक़ा( charity) माना जाता है।" (सही बुख़ारी)। एक पेड़ लगाने को दान का दर्जा देना, यह कितनी दूरदर्शी सोच है।

इससे भी आगे जाकर, पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०) ने पानी, जंगल और जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए विशेष संरक्षित क्षेत्र बनाए, जिसे आज हम "नेचर रिज़र्व" कहते हैं। और एक हदीस में कहा गया- (भावार्थ)"जो किसी भी जीव के साथ अच्छा व्यवहार करता है, उसे(सवाब) इनाम मिलता है।"-(सही बुख़ारी)। यानी इस्लाम में दया और करुणा का दायरा सिर्फ़ इंसानों तक नहीं, बल्कि हर जीव-जंतु और प्रकृति तक फैला हुआ है।

 निष्कर्ष 

क़ुरान में अल्लाह तआला फ़रमाता है, "खुश्की (ज़मीन) और तरी(समुद्र) में फ़साद फैल गया है इंसानों के अपने हाथों की कमाई से।" (सूरह रूम: 41)। यह आयत चौदह सौ साल पहले नाज़िल हुई थी, लेकिन आज के दौर में यह किसी वैज्ञानिक रिपोर्ट से कम सटीक नहीं लगती। (UN Climate Report, 2024) हमें बताती है कि वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान को 1.5°C तक सीमित रखने के लिए 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 43% की कटौती ज़रूरी है और यह तभी संभव है जब इंसान अपनी ज़िम्मेदारी को सच्चे मन से स्वीकार करे।

इस्लाम यह स्पष्ट करता है कि धरती इंसान की मिल्कियत नहीं, बल्कि एक अमानत है। ग्लोबल वार्मिंग आज सिर्फ़ एक वैज्ञानिक समस्या नहीं रही, यह एक नैतिक और आध्यात्मिक चुनौती भी है और इस चुनौती का जवाब देने के लिए इस्लाम की शिक्षाएँ एक रोशन रास्ता दिखाती हैं, संयम, देखभाल, और हर जीव के प्रति ज़िम्मेदारी का रास्ता। अगर आज की दुनिया इन सिद्धांतों को सच्चे मन से अपना ले, तो शायद हम उस नुक़सान को रोक सकते हैं जो हमने ख़ुद अपने हाथों से किया है।


रज़िया मसूद

भोपाल, मध्य प्रदेश

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