सामाजिक सौहार्द, इंसानी स्वभाव का अभिन्न अंग
सामाजिक सौहार्द और भाईचारा इंसानी स्वभाव का हिस्सा है। इसलिए समाज को प्रदूषित करने के प्रयासों के बावजूद सामाजिक समरसता की दिल छूने वाली मिसालें सामने आती रहती हैं। ऐसी ही एक घटना कर्नाटक के तटीय क्षेत्र के एक छोटे से गांव से सामने आयी। (Radiance Weekly, 30 May, 2026)
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ ज़िले के बांडीकोटे गाँव में स्थित मलाराया मंदिर में ब्रह्म कलशोत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सव है, जिसके कारण पूरे गाँव में उत्साह था। शाम तक उत्सव से जुड़े अनुष्ठान, जैसे वास्तु पूजा और सामूहिक भोजन, शुरू हो चुके थे और बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हो गए थे।
मंदिर के पड़ोस में मुस्लिम समुदाय के हसैनार नामक व्यक्ति रहते थे। उत्सव के बीच अचानक ख़बर मिली कि उनकी तबीयत बिगड़ गई है। मंदिर प्रबंध समिति के सदस्य और स्थानीय निवासी लोग तुरंत हसैनार की मदद के लिए पहुँचे और बिना देरी किए उन्हें अस्पताल पहुँचाने की व्यवस्था की। तमाम प्रयासों के बावजूद उनको बचाया नहीं जा सका।
हसैनार के निधन की ख़बर मिलते ही मंदिर समिति ने जो निर्णय लिया, उसने अनेक लोगों का दिल जीत लिया। उत्सव जारी रखने के बजाए समिति ने सर्वसम्मति से मंदिर के कार्यक्रमों को रोकने और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने तक सामूहिक भोजन को स्थगित करने का निर्णय लिया। कई घंटों तक मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा रहा, न कोई उत्सव, न संगीत और न ही सामूहिक भोज। गाँव के लोगों और मंदिर प्रबंधन का मानना था कि पड़ोस में एक परिवार शोक में डूबा हो तो ऐसे समय में उत्सव मनाना उचित नहीं होगा।
पूरे गाँव का वातावरण एकजुटता और सहानुभूति का प्रतीक बन गया। ग्रामीणों का कहना था कि यह निर्णय पूरी तरह स्वाभाविक तथा साझा मानवीय मूल्यों से प्रेरित था। उनके लिए हसैनार केवल मंदिर के पास रहने वाले एक मुस्लिम पड़ोसी नहीं थे, बल्कि उसी सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा थे जो पूरे समाज को जोड़ता है।
इस घटना ने इसलिए भी ध्यान आकर्षित किया क्योंकि यह उन सांप्रदायिक तनाव व नफ़रत के बीच आपसी सौहार्द की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करती है जो अक्सर ख़बरों की सुर्खियों में दिखाई देते हैं। दक्षिण कन्नड़ जैसे क्षेत्र में, जहाँ राजनीतिक ध्रुवीकरण और धार्मिक तनाव की घटनाएँ सामने आती रही हैं, मलाराया मंदिर समिति का यह क़दम सह-अस्तित्व, सहानुभूति और पारस्परिक सम्मान का एक अनूठा संदेश लेकर आया।
स्थानीय लोग बताते हैं कि इस क्षेत्र में विभिन्न समुदायों के रिश्ते पीढ़ियों से साझा जीवन, व्यापार, त्योहारों और रोज़मर्रा के संबंधों के माध्यम से गहराई से जुड़े हुए हैं। गाँव के बुज़ुर्गों का कहना है कि कभी भारत में ऐसा भाईचारा सामान्य बात थी, जब धर्म की परवाह किए बिना लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होते थे।
बांडीकोटे की यह घटना कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के ऐतिहासिक संबंधों की भी याद दिलाती है। इतिहासकारों के अनुसार सदियों पहले जब अरब व्यापारी यहाँ आए, तो स्थानीय शासकों और समुदायों ने उनका स्वागत किया। इससे सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला और इस क्षेत्र की बहुलतावादी पहचान मज़बूत हुई। मंदिर, मस्जिद और बाज़ार अक्सर एक-दूसरे के साथ विकसित हुए और आपसी विश्वास व सहयोग पर टिके रहे।
वास्तव में, बांडीकोटे में जो हुआ, वह कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि भारत की उस व्यापक सभ्यतागत सोच का हिस्सा है, जिसमें धर्म का उद्देश्य इंसानियत को मज़बूत करना है। सामाजिक चिंतकों और स्थानीय नेताओं ने इस घटना की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में समाज को ऐसे ही मेल-मिलाप और सामाजिक एकता के उदाहरणों की आवश्यकता है।
उनका मानना है कि ऐसी कहानियों को व्यापक स्तर पर सामने आना चाहिए, क्योंकि ये उन अनगिनत भारतीयों की वास्तविकता को दर्शाती हैं जिनके रोज़मर्रा के संबंध राजनीति और धर्म की सीमाओं से कहीं ऊपर होते हैं। गाँव के लोग कहते हैं कि उन्होंने कोई असाधारण काम नहीं किया। लेकिन आज के गहरे ध्रुवीकृत माहौल में, एक शोकग्रस्त परिवार के साथ खड़े होने का उनका यह साधारण-सा मानवीय क़दम बांडीकोटे से बहुत दूर तक लोगों के दिलों को छू गया।
उत्तराखंड की घटना
यहां एक अन्य घटना का उल्लेख भी उचित होगा जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। (संदर्भ अमर उजाला 2 मई, 2022)। उत्तराखंड के प्रसिद्ध नगर काशीपुर की दो हिंदू बहनों ने स्थानीय ईदगाह के विस्तारण के लिए चार बीघा क़ीमती ज़मीन दान की। स्थानीय ईदगाह मैदान के पास लाला बृजनंदन प्रसाद रस्तोगी के परिवार की ज़मीन थी।
रस्तोगी जी इस को ईदगाह के लिए दान करने के इच्छुक थे क्योंकि वह देखते थे कि मुस्लिम समुदाय को ईद की नमाज़ में जगह कम पड़ रही है। इस बीच रस्तोगी जी का निधन हो गया। ज़मीन उनकी बेटियों ‘सरोज’ और ‘अनीता’ के नाम आगयी। दोनों बहनों ने दिवंगत पिता की इच्छा का पूर्ण सम्मान करते हुए एवं सांप्रदायिक भाईचारे की अनोखी मिसाल पेश करते हुए 4 बीघा भूखंड ईदगाह को स्वेच्छा से दान कर दिया, जिसकी क़ीमत डेढ़ करोड़ से अधिक बताई जाती है।
इसी प्रकार किसी आपदा या दुर्घटना के समय अपनी जान को जोखिम में डालकर इन्सानों को बचाने की ख़बरें भी इसी तथ्य को सत्यापित करती हैं। दिसंबर 2025 की उत्तर प्रदेश के पीलीभीत की वह घटना सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई जिसमें दिखाया गया है एक व्यक्ति कार सहित गहरे तालाब में डूब रहा है। किनारे खड़े लोग केवल वीडियो बना रहे हैं या पुलिस से सहायता की गुहार लगा रहे हैं।
इसी बीच मोहम्मद फ़ैसल अकेला डूबते व्यक्ति को बचाने जा पहुंचता है। एक समय ऐसा लगा कि यह दोनों ज़िन्दगी से ज़्यादा मौत के निकट हैं। मगर फ़ैसल उस डूबते व्यक्ति को बचा लाया जिसका नाम शुभम तिवारी था। कुछ महीने पहले कोटद्वार में ‘बाबा गारमेंट्स’ नाम पर आपत्ति के विवाद में दुकान के मुस्लिम मालिक को बचाते हुए जब जिम ट्रेनर दीपक कुमार ने, पूछे जाने पर, अपना नाम मोहम्मद दीपक बताया था, तब दीपक कुमार संभवतः इसी साझी विरासत की ओर इशारा कर रहे थे।
वास्तविकता यह है कि सारे इंसान एक जोड़े की संतान हैं। संस्कृत में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और अरबी भाषा में ‘अल-ख़ल्क़ु अयालुल्लाह’ (सारे इंसान अल्लाह/ईश्वर का कुनबा हैं), एक साझा संदेश देते हैं कि मानवता का रिश्ता एक सार्वभौमिक और अटूट रिश्ता है। इसी के प्रचार प्रसार एवं व्यवहार की आज सबसे अधिक आवश्यकता है। इस रिश्ते को प्रदूषित करने वाले सभी प्रयासों के प्रति जागरूक रहना तथा उन प्रयासों को अप्रभावी तथा असफल बनाना एक सभ्य समाज का परम कर्तव्य है।
डा० फ़रहत हुसैन