सोशल मीडिया के आवरण में विलुप्त होती सुधार की प्रवृत्ति
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राष्ट्रीय परिदृश्य

सोशल मीडिया के आवरण में विलुप्त होती सुधार की प्रवृत्ति

हम लोगों ने अपनी बाल्यवस्था इस प्रकार से व्यतीत की है कि किसी भी छोटी मोटी शरारतों या गलत कार्यों पर बड़े बुज़ुर्ग सुधार हेतु प्रयास करते थे। हमारे गलत कृत्यों पर अकसर बड़े बुज़ुर्गों के मुंह से किसी भी छोटी मोटी शरारतों में ‘बेटा यह गंदी बात’ यह जुमला ज़रुर सुना करते थे। जिसकी वजह से हर गलत चीज़ के नज़दीक पहुंचते ही वह गंदी बात वाला डायलॉग सामने आ जाता था और खुद ब खुद कदम गलत हरकत करने से रुक जाते थे। फिर चाहे कहीं रखे हुए पैसे उठाने का मन हो, क्लास में किसी के बैग से कोई चीज़ चुराने का मन हो, या फिर गुस्से में किसी को अपशब्द कहने का मन हो। अंतरात्मा ज़ोर ज़ोर से पुकारने लगती थी कि यह “गंदी बात” है। लगभग हम सभी इसी संस्कार और परिवेश के साथ इस भारतीय समाज में पले बढ़े हैं। 

जिसका प्रभाव हमारे संस्कारों में और हमारे समाज में सदियों से देखने को मिलता था। बुज़ुर्गों को सम्मान मिलता था। आस पड़ोस में रहने वाले लोग अपने सगे संबंधी समान समझे जाते थे। फिर चाहे उनका कोई भी धर्म हो या कोई भी विचारधारा। एक दुसरे की खुशियां अपनी खुशिय़ां लगती थीं, एक दुसरे का गम अपना गम प्रतीत होता था। महिलाओं को सम्मान मिलता था फिर चाहे अपनी बहन बेटियां हों या पड़ोसी की या फिर गली के किसी दूसरे छोर पर रहने वाली कोई अन्य महिला। जब किसी लड़की की शादी होती थी तो ऐसा लगता था पूरे मोहल्ले की बिटिया विदा हो रही। जो कि समाजवाद का एक जीवंत उदाहरण था। हर घर, हर परिवार और हर इंसान काम में हाथ बटाने का ज़िम्मा उठा लेता था। जब बारात आती थी तो ऐसा लगता था मानो पूरे मोहल्ले की बारात आयी हो। हर घर खातिरदारी में लग जाता था। लेकिन फिर अचानक से हमारी इस मिली जुली तहज़ीब पर किसी की नज़र लग गई। सोशल मीडिया का दौर आया और जो चीज़ें हम बचपन से गंदी या बुरी समझते थे हर वह चीज़ हमारे लिए आसानी से उपलब्ध होने लगी। जिस कारण धीरे धीरे उसे बुरा या गंदा समझने का ख्याल ही मन से निकलने लगा।

किसी की पोस्ट अच्छी लगी कॉपी किया और अपने वॉल से पोस्ट कर दिया। अंतरात्मा को यह तसल्ली दिला दी कि चोरी नहीं कॉपी किया है। फेक आईडी बनाकर किसी को परेशान कर मज़ा आने लगा तो दिल को तसल्ली दिला दी कि बस थोड़ा सा फन कर रहे हैं। पोर्नोग्रॉफी को अडल्ट कंटेट का टैग लगाकर भी हम गलत को सही साबित करने में सफल हो गए। और फिर धीरे धीरे हर वह गलत काम सही होने लगे जिसको हमारे समाज में सदियों से बुरा समझा जाता था। 

जब बुराई को बुरा समझना छोड़ दिया जाए तो समाज के सड़ने की शुरुआत हो जाती है और यही हमारे समाज के साथ भी हुआ। हाल ही में उत्तर प्रदेश में देश का सबसे बड़ा धार्मिक महोत्सव ‘महाकुंभ’ का आयोजन हुआ। जिसके लिए दावा किया जा रहा है कि उसमें करोड़ों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। इसी महाकुंभ में कुछ लोग महिलाओं के नहाने के वीडियो सोशल मीडिया पर बेच रहे थे। मीडिया सूत्रों के मुताबिक मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर बने एक चैनल के ज़रिए महिलाओं के वीडियो अलग अलग कीमत पर बेचे जा रहे थे। जिसमें संगम में डुबकी लगाती महिलाओं के वीडियो व आपात्तिजनक रुप से ली गई तस्वीरों समेत अलग अलग प्रकार के वीडियो और फोटो मौजूद थी जो अलग अलग दामों पर बिकती थी। इनमें प्रसव पीड़ा के दौरान की महिलाओं के वीडियो व फोटो, किसी शॉपिंग मॉल में चेंजिंग रुम में कपड़े चेंज करने वाली फोटो व वीडियोज़ समेत दर्जनों ऐसे वीडियो क्लिप और फोटो मौजूद थे जिन्हें देखना ना केवल पाप बल्कि हमारे इंसान होने के दावे को भी प्रश्नचिन्ह लगाने समान है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन सारे वीडियो और फोटो की ऊंची ऊंची कीमत लगाकर बेचा जा रहा था। 

यह कोई पहला किस्सा नहीं है। सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ होने वाली इस प्रकार की ढेरों बर्रबरताओं की कहानी भरी पड़ी है। जहां महिलाओं को तरह तरह के तरीके ढूंढ अपमान करने का प्रयास किया जाता है। डिजिटिल मीडिया प्लेटफॉर्म द क्विंट की एक रिपोर्ट के अनुसार इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ढेरों ऐसी फेक आईडी मौजूद है जहां एआई टूल के द्वारा महिलाओं की अश्लील फोटो बनाकर उसे दूसरे धर्म के लड़कों के साथ अश्लील हरकत करते हुए दिखाया जाता है। इसी प्रकार कुछ वर्ष पूर्व बुल्ली बाई और सुल्ली डील नाम से सोशल मीडिया पर महिलाओं की बोली लगायी जा रही थी। इसमें सोशल मीडिया अकाउंट से मुस्लिम महिलाओं की फोटो लेकर उसे अश्लील तरीके से पेश करते हुए उसकी बोली लगाई जा रही थी। 

भले ही महाकुंभ के वीडियो पर एक्शन लेते हुए कई लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई हो और अकाउंट्स डिलीट करवाए गए हों, भले ही सुल्ली डील और बुल्ली बाई मामले में भी एक्शन लिया गया हो लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि इस प्रकार के घृणित कृत्य को समाज में पनपने कैसे दिया जाता है? कैसे हमारे समाज की सोच इस हद तक घिनौनी हो गई है कि वह इस प्रकार के कृत्य को ज़ोर शोर से बढ़ावा देते हुए खुद को गर्वित कैसे महसूस कर लेती है? कैसे हमारा पुरुष समाज महिला सम्मान के बड़े बड़े दावे करने के बाद इस प्रकार के वीडियो या कंटेट तक पहुंचने का साहस कर लेता है? 

कारण केवल एक ही है वह यह कि हमने सही और गलत के बीच के बारीक फासले को मिटाने के लिए उस पर नफरत की ऐसी दवा छिड़की जो उल्टा दीमक बन कर देखते ही देखते हमारे समाज की अच्छाईयों को खाने लगी और आज हम उस जगह खड़े हैं जहां प्यार और सम्मान की बात तो दूर सही और गलत की मंजिल पर ऐसी गहरी धुंध जमी हुई है कि अंतर करना धीरे धीरे अंसभव होता जा रहा है। अगर हमें अपने गौरवशाली इतिहास वाले भारतीय समाज जहां महिलाओं को देवी समान पूजा जाता था वह प्रतिष्ठा वापस लानी है तो सबसे पहले लोगों को समझाना होगा कि वह बुराई को बुरा समझें और उसे रोकने के लिए जी जान लगा दें। सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करें जागरुक रहें, सतर्क रहें और ऐसे तमाम नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स, मैसेजिंग ग्रुप्स, चैनल और लोगों से दूर रहें। इस प्रकार कोई भी कंटेट दिखे तो सबसे पहले रिपोर्ट करें और दूसरों को सतर्क करें। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए कानूनी कार्रवाई के लिए व्यक्तिगत एवं संगठित रुप से भी प्रयास किया जाए ताकि शासन एवं प्रशासन ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए ना केवल ऐसे अपराधों में संलिप्त लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे, बल्कि ऐसे सिंडीकेट से संबंधित मास्टरमाइंड व्यक्तियों तक पहुंच कर पूरे सिंडीकेट को समाप्त करने का प्रयास करे। 

सहीफ़ा खान

उप संपादक


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