आज के मुश्किल हालात और मुस्लिम उम्मत के प्रकाशमान पहलू
मुस्लिम उम्मत हर हाल में मज़बूत, स्थिर और सख्त जान कौम है। यह समाज पंद्रह सौ सालों से ऐसे हालात से गुज़रा है कि इसका वजूद खत्म होने की कगार पर था और अगर यह कोई दूसरी कौम होती, तो धरती से गायब हो चुकी होती। लेकिन मुस्लिम उम्मत फिर से ज़िंदा हुई और पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर उभरी। किसी शायर ने बहुत अच्छा कहा है।
इस्लाम की फ़ितरत में कुदरत ने लचक दी है
उतना ही यह उभरेगा जितना के दबाओगे।
आज भी मुस्लिम उम्मत उन्हीं मुश्किल हालात का सामना कर रही है। वैश्विक स्तर पर और हमारे देश के स्तर पर, मुस्लिम उम्मत मुश्किल दौर से गुज़र रही है। मुस्लिम उम्मत को आतंकवादी और पिछड़ा बता कर उसके ख़िलाफ़ एक माहौल बनाया जा रहा है। इस्लामोफ़ोबिया की परिस्थिति का निर्माण करके उन्हें अलग-थलग करने की साज़िशें भी रची जा रही हैं। हमारे देश में भी हर दिन एक नई मुसीबत और समस्या हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। कभी बाबरी और ज्ञानवापी की तरह मस्जिदों को मंदिर बनाने की कोशिशें, कभी दुकानों, घरों, मज़ारों और मस्जिदों, मदरसों पर बुलडोज़र हमले, कभी मॉब लिंचिंग जैसी क्रूर घटनाएँ, कभी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के नाम पर उन्हें इस्लामी शरियत से बे दखल कर देने की साज़िशें, कभी SIR के नाम पर उनकी नागरिकता और पहचान मिटाने की कोशिशें, कभी उन्हें नमाज़, अज़ान और उनके धार्मिक मामलों से रोकने और उलझाने की कोशिशें।
फिर भी, मुस्लिम उम्मत ज़रा सी भी हताशा या निराशा के बिना अपने तरीके से मज़बूती से आगे बढ़ रही है। और क्यों न हो, उन्हें पता है कि जो भी हालात बन रहे हैं, वे अल्लाह की तरफ़ से हैं और वही इस हालात को बदलने का सामर्थ्य रखता है और अल्लाह किसी पर उसकी सहनशक्ति से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है: “कोई मुसीबत नहीं आती मगर अल्लाह की इजाज़त से आती है।“ (सूरह: अल-तगाबुन-11) और “अल्लाह किसी पर उसकी सहन शक्ति से ज़्यादा जवाबदारी का बोझ नहीं डालता” (सूरह: अल-बक़रा 286)
उम्मत का मानना है कि ऐसे हालात या तो अल्लाह की तरफ़ से एक परीक्षा या आज़माइश के तौर पर निर्मित किए जा रहे हैं, या अल्लाह उनमें और योग्यता पैदा करना और उनका रुतबा बढ़ाना चाहता है। इसलिए, हम देखते हैं कि जब भी उम्मत को ऐसे मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा है, तो उनके अंदर एक नया जोश, उत्साह, ताकत और नेतृत्व पैदा हुआ है।
भारत में, हिंदू धर्म ने बाकी सभी धर्मों के अलग-अलग वजूद को खत्म करके उन्हें अपने में शामिल कर लिया, जैसे जैन धर्म, बौद्ध धर्म और आखिर में सिक्ख धर्म, लेकिन वह इस्लाम को इस तरह से अपने अंदर विलीन करने में बुरी तरह नाकाम रहा।
आइए कुछ ऐसी खासियतों पर बात करते हैं जो सिर्फ़ मुस्लिम उम्मत में पाई जाती हैं, जो इतने मुश्किल हालात में भी उसके बने रहने की वजह हैं।
1) अल्लाह पर पूरा भरोसा
"तवक्कुल अलल्लाह" यानी अल्लाह पर सम्पूर्ण भरोसा मुस्लिम उम्मत की सबसे बड़ी ताकत है, और आज, जब उम्मत में अल्लाह पर भरोसा और ईमान की गहराई अपने सबसे निचले स्तर पर है, फिर भी इसकी इस शक्ति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उम्मत इतने मुश्किल हालात में भी मज़बूती से खड़ी है। जैसा कि पहले बात हो चुकी है, यह यक़ीन कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है और वही उम्मत की हिफ़ाज़त के लिए काफ़ी है।
"हसबुनल्लाहु व ने’मल वकील" (अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वही सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है।) यह मुबारक आयत उनका ब्रह्म वाक्य और उनकी ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत है। यह कमज़ोर विश्वास आज भी इतना असरदार है कि यह मुस्लिम उम्मत को ऐसी ताकत देता है जो किसी और समाज में देखने को नहीं मिलती। इसी ताकत की वजह से उम्मत आज भी दुनिया को लीड कर रही है और यही ताकत उसे भविष्य में भी दुनिया का लीडर बना सकती है।
अल्लाह पर इसी भरोसे की वजह से मुसलमानों में मानसिक रोग और आत्महत्या के मामले बहुत कम होते हैं और बड़े से बड़े नुकसान के बाद भी उनके माथे पर दुख की कोई लकीर नज़र नहीं आती। किसी अपने प्रिय की मौत भी उन्हें विचलित नहीं करती और वो पुकार उठाते हैं: इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन (हम अल्लाह के हैं और अल्लाह की तरफ लौटेंगे)।
2) दीन से संबंध और दीनी चेतना
मुस्लिम उम्मत का दीन (इस्लाम) से जो गहरा रिश्ता है, वह किसी दूसरे समाज या धर्म को मानने वालों में नहीं देखा जाता। यह संबंध ही इसकी सामाजिक शक्ति का केंद्र है। हालांकि यह रिश्ता विविध बाह्य परिस्थितियो की वजह से कमज़ोर हुआ है और इस रिश्ते की समझ और गहराई भी कम हुई है, फिर भी यह रिश्ता इसकी विशेषताओ में से एक है। इसके अलावा, हाल के दिनों में यह रिश्ता फिर से मज़बूत हो रहा है, खासकर युवाओं और महिलाओं में। क़ुरआन को समझने, इस्लाम का ज्ञान प्राप्त करने, नमाज़ और रोज़े के पालन की कोशिशें दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। दीन के प्रति चेतना (होश) भी बढ़ रही है। और यही मुस्लिम उम्मत के उत्थान की दिशा तय कर रही है।
3) मज़बूत पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था
मुस्लिम समाज की आदर्श और धार्मिक पारिवारिक व्यवस्था आज के हालात में उसकी सबसे बड़ी खूबी और खासियत है। आज जब पूरी दुनिया में पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो रही है, तब भी क़ुरआन के उसूलों पर आधारित यह व्यवस्था कम या अधिक मुस्लिम समाज में देखने को मिलती है। क़ुरआन, जिसने निकाह को इबादत का दर्जा दिया है, पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चों का पालन पोषण, दूर और करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों के अधिकार को भी इबादत का दर्जा दिया है।
इसका असर आज भी मुस्लिम समाज में देखने को मिलता है और यह उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित करता है। आज मुस्लिम समाज में माता-पिता का सम्मान और इज्ज़त बरकरार है, यही वजह है कि मुस्लिम समाज में वृद्धाश्रम (ओल्ड एज होम) की संख्या न होने के बराबर है। एक समय था जब अनाथ बच्चों के लिए भी अलग घर नहीं खोले जाते थे और परिवार उन्हें अपने परिवार के सदस्यों की तरह पालते थे। हालांकि, अब बाहरी असर की वजह से मुस्लिम समाज में भी अनाथ आश्रम बढ़ने लगे हैं, लेकिन उनकी संख्या अभी भी कम है।
एक मशहूर पश्चिमी विचारक डेविड सेलबोर्न की एक किताब काफी चर्चा में है।“ Losing battle with Islam” (इस्लाम के साथ हारी हुई लड़ाई) नाम की इस किताब में वे लिखते हैं कि पश्चिम, इस्लाम के साथ सभ्यता की लड़ाई हारने की कगार पर है, और इसके लिए उन्होंने जो दस कारण बताए हैं, उनमें सर्व प्रथम कारण इस्लामी समाज की मज़बूत पारिवारिक व्यवस्था है।
4) लोगों की सेवा और अल्लाह की राह में खर्च करने की भावना
मुस्लिम समाज की एक खास बात है मुस्लिमो की समाज सेवा की भावना, अर्थात खिदमते खल्क़। जब भी दुनिया में कहीं कोई परेशानी आती है, तो मुसलमान सबसे पहले दौड़ पड़ते हैं। अगर हम अपने देश और राज्य को भी देखें, तो चाहे भारी बारिश हो, बाढ़ हो, भूकंप हो या कोई और महामारी, मुस्लिम समाज हमेशा सेवा के लिए तत्पर रहता है। अपनी जान की परवाह किए बिना, वे लोगों को बचाने के लिए कूद पड़ते हैं। कोरोना काल में मुसलमानों ने जिस तरह से सेवा की है, उसे देश भूल नहीं पाया है। इसका कारण क़ुरआन की शिक्षाएं और पैगंबर मुहम्मद ﷺ की शिक्षाएं और उनके आदेश हैं। यह भी मुस्लिम उम्मत की एक बड़ी खासियत और ताकत है।
5) इस्लामी पहचान पर गर्व
एक मुसलमान जिसका अपने धर्म से रिश्ता कितना ही कमज़ोर क्यों न हो और वह व्यवहार में भी इस्लाम से कितना ही दूर क्यों न हो, फिर भी उसके मन में इस्लाम के लिए बहुत प्यार और गर्व की भावना होती है। भले ही वह इस्लाम के उसूलों पर न चले, वह इस्लाम के लिए अपनी जान क़ुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहता है, वह किसी भी हालत में इस्लाम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो सकता। यही वजह है कि मुस्लिम समाज अपने धर्म की बुनियाद से मज़बूती से जुड़ा हुआ है। और इसी कारण मुस्लिम समाज दूसरे समाजों से अलग दिखता है।
6) सब्र और लगन
मुसलमानों में सब्र (सब्र) और अपने उसूलों पर जमे रहना (इस्तिक़ामत) और दीन के प्रति मज़बूती की भावना एक ऐसी खूबी है जो उन्हें हर हाल में खुद को संभाले रखने और आगे बढ़ने और समाज को ज़िंदा रखने के लिए प्रेरित करती है। यह खूबी भी दूसरे समाज में बहुत कम देखने को मिलती है।
7) मस्जिद की भूमिका
मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए धुरी का काम करती है। मुस्लिम समाज की हर गतिविधि वहीं से संचालित होती है और वहीं पर केन्द्रित रहती है। हालांकि मौजूदा हालात में मस्जिद का यह प्रभाव कम हो गया है। लेकिन, आज भी मस्जिद की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है और वही उनकी शक्ति का स्त्रोत है। समाज को सीधा रास्ता दिखाने और उनके प्रशिक्षण का कठिन काम आसानी के साथ पांचों वक्त की नमाज़ों, जुमे की नमाज़ों और ईद की नमाज़ों से किया जा सकता है।
8) वैश्विक भाईचारे की भावना
“कुल्लू मोमिनुन इख्वा” (सभी मोमिन भाई भाई हैं) जैसी शिक्षाओं और पैगंबर ﷺ की हदीस: “अल मुस्लिमुन क रजुलिन वाहिद” (मुसलमान एक शरीर की तरह हैं) की वजह से, मुसलमान, चाहे वे किसी भी देश में और दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों, एक-दूसरे से भावनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं और जब भी किसी मुसलमान को कहीं भी कोई परेशानी होती है, तो पूरा मुस्लिम समुदाय उसका दर्द महसूस करता है और उसके साथ खड़ा होता है। दुनिया भर में भाईचारे की यही भावना इसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
ये सभी खूबियां हैं जो आज भी मुस्लिम समाज को मजबूत बनाती हैं और किसी भी मुश्किल हालात में डटे रहने की हिम्मत देती हैं। अगर ये खूबियां वास्तव में सही तौर पर विकसित हो जाएं, तो मुस्लिम उम्मत को दुनिया का नेतृत्व करने से कोई रोक नहीं पाएगा। और क़ुरआन की यह आयत अपने पूरे अर्थ के साथ पूरी हो जाएगी।
“कून्तुम ख्यर उम्मतिन उखरिजत लिन्नास” (अब आप दुनिया की वह बेहतरीन उम्मत हैं, जिसे मानवता के मार्गदर्शन और बेहतरी के लिए मैदान में उतारा गया है।)
डॉ. मोहम्मद सलीम पटीवाला
स्वतंत्र लेखक, गुजरात