ममता बनर्जी और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक संग्राम
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विविध

ममता बनर्जी और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक संग्राम

बीते वर्ष जब चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर प्रक्रिया चालू करने की घोषणा की गई तब से गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत जितने भी राज्यों में SIR की प्रक्रिया चल रही है वहां जनता में इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर कई सवाल उठ रहे हैं।

इसी सिलसिले में 4 फरवरी 2026 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने न केवल अदालत का दरवाजा खटखटाया बल्कि स्वयं 'पार्टी इन पर्सन' के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर खुद अपनी दलीलें पेश की, ममता बनर्जी का यह कदम राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में एक विरल और ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज हो गया है।

सत्ता के गलियारों में अपना लोहा मनवाने वाली ममता बनर्जी ने अपनी चिर परिचित सादगी में मुख्य न्यायाधीश (CJI)  सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने दलील पेश की। उन्होंने भावुक होते हुए कहा सर "लोकतंत्र को बचाए जब न्याय बंद दरवाजे के पीछे रोता हैं तो लगता है कि कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा"

प्रमुख आरोप और दलीलें

ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि एसआईआर के बहाने मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाताओं को जोड़ना नहीं बल्कि हटाना है उनके अनुसार लगभग 58 लाख मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं।

महिलाओं को निशाना बनाना

ममता बनर्जी ने कोर्ट के समक्ष दलील पेश करते हुए कहा कि इस एसआईआर प्रक्रिया से सबसे ज़्यादा प्रभावित महिलाएं हो रही हैं। क्योंकि अकसर विवाह के बाद महिलाओं का सरनेम और एड्रेस बदल जाता है। ऐसी महिलाओं को इस प्रक्रिया से सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।

पक्षपात का आरोप

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव आयोग केवल व्हाट्सएप कमिशन बनकर रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य राज्यों की तुलना में बंगाल के साथ दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है।

आधार कार्ड की स्वीकार्यता

उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य राज्यों में आधार को पहचान के रूप में स्वीकार किया जा रहा है तो बंगाल में इसे दरकिनार क्यों किया जा रहा है। 

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की और आदेश दियाः- 

1) कोर्ट में राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी पर चिंता जताई। 

2) विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया के वे जिला न्यायाधीश के स्तर के वर्तमान और सेवानिवृत्त न्यायीक अधिकारियों को नियुक्त करें जो इस पूरी प्रक्रिया की जांच करें।

3) कोर्ट ने चुनाव आयोग की डिजिटल टूल्स की भी आलोचना की और कहा कि सख्त कंप्यूटर लॉजिक और एल्गोरिथम किसी भी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार को रद्द नहीं कर सकता। 

4) अदालत ने बंगाल के डीजीपी को हलफनामा दायर करने का भी आदेश दिया और चेतावनी दी कि यदि चुनावी प्रक्रिया में बाधा डाली गई तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

एक महिला मुख्यमंत्री के रुप में स्वयं पार्टी इन पर्सन अदालत के समक्ष पेश होना देश के इतिहास में पहली बार हुआ। ममता बनर्जी के इस कदम की देश विदेश के मीडिया में विशेष कवरेज हुई। उनके इस कारनामे की कुछ लोगों ने सराहना की तो कुछ ने इसे सियासत का मास्टरस्ट्रोक माना।

SIR से बीजेपी को फायदा 

 SIR के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी का इरादा ऐसे मतदाताओं को काटने का है जो आमतौर पर उन्हें वोट नहीं देते हैं। इस मामले में वह चुनाव आयोग का भरपूर उपयोग कर रहे हैं विशेष रूप से ड्राफ्ट सूची बनाने में उन्होंने जो दस्तावेजों की सूची रखी है वह नागरिकता साबित करने के लिए है जो चुनाव आयोग के कार्य क्षेत्र में नहीं आता। 

 इसी तरह ड्राफ्ट सूची तैयार हो जाने के बाद उन्होंने फॉर्म नंबर ७ भरवा कर गुजरात समेत सभी राज्यों में हाहाकार मचा दिया है। जिन बूथों पर उन्हें वोट नहीं मिलते वहां भाजपा कार्यकर्ताओं ने सो सो आपत्ति आवेदन किए हैं।


डॉक्टर तसनीम वोहरा

वीजापुर, गुजरात

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