नेकदिल मर्द और पाकीज़ा ख़ातून.
(भाग 2)
जब क़मरून्निसा और कामना देवी मुन्ने खाँ के घर पहुँची शहर के तमाम लोग इकट्ठे हो चुके थे। हालाँकि लॉकडाऊन के कारण सरकार की तरफ़ से जनाज़े मे इतने सारे लोगों के इकट्ठे होने की परमिशन नहीं थी। मगर कौन किसको रोकता। जो सुनता वही भागा चला आ रहा था। सबके मुंह पर उनकी तारीफ़ें थीं।
मुन्ने खाँ एक मामूली सब्ज़ी वाले थे मगर आज कल बहुत लोकप्रिय थे। वे कुछ दिन पहले तक आवाज़ लगाकर हाथ ठेले पर सब्ज़ी बेचा करते थे। लॉकडाऊन के दौरान मुसलमान होने की वजह से लोगों ने उनसे सब्ज़ी ख़रीदना बंद कर दिया था। मई जून के महीने की कड़कती धूप में दिन भर सारे मुहल्लों में आवाज़ लगाकर ठेला घसीटते फिरते लेकिन कोई उनसे सब्ज़ी नहीं ख़रीदता था।
उन दिनों और लोगों की तरह उनको भी आर्थिक तंगी में ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर होना पड़ा। उन्होंने डीएम से परमिशन लेकर चौराहे पर एक कोने में बैठकर सब्ज़ी बेचना शुरू कर दिया। फिर भी इक्का दुक्का लोग ही उनसे सब्ज़ी ख़रीदने आते थे। लेकिन मानव कुमार जी, धर्म लाल गुप्ता, सरदार लखपत सिंह, दौलत खाँ ड्राईवर, डेविड और पप्पू यादव से उनके अच्छे ताल्लुक थे इसलिए वे उन्हीं से सब्ज़ी ख़रीदने आते थे क्योंकि ये लोग उनके एहसान नहीं भूले थे जबकि मुन्ने ख़ाँ ने बिना किसी भेदभाव के शहर में सबके साथ कुछ न कुछ भला किया होगा, फिर भी अख़बार और टीवी की ख़बरें सुनकर लोग उनसे नफ़रत और परहेज करने लगे थे।
इसी बीच एक दिन मुन्ने ख़ाँ की तबीयत ख़राब हुई तो मानव कुमार जी उनके घर हाल चाल लेने पहुँच गये। हालाँकि कम्मो ने रोका था लेकिन जब मानव कुमार जी ने अपने बेटे राजू की तबीयत ख़राब होने पर मुन्ने ख़ाँ के परिवार की सेवाओं का हवाला दिया तो वह शांत हो गईं। मानव कुमार जी ने मुन्ने खाँ की पत्नी मुन्नी बेगम को सलाह दी कि जब तक उनकी तबीयत ख़राब है, आप सब्ज़ी बेचिये, मुन्ने ख़ाँ को इलाज के भी पैसे की ज़रुरत है और घर के ख़र्च के लिये भी। मुन्नी बेगम को उन्होंने पाँच हज़ार रूपये उधार भी दिये।
कामना ने इस पर ऐतराज़ किया था लेकिन उनके बेटे राजू, बहु सुधा ने समझा दिया कि किसी ग़रीब की मदद करने में कोई बुराई नहीं। कामना देवी की शंका को देखते हुये बहू ने यह भी समझाया कि न तो पापा ऐसे वैसे आदमी हैं और न ही मुन्नी बेग़म भी ऐसी वैसी औरत हैं।
कामना देवी भी जानती हैं कि मुन्ने ख़ाँ की पत्नी मुन्नी बेग़म बहुत ख़ूबसूरत हैं और अच्छी बातचीत कर लेती हैं लेकिन परदे वाली पाकीज़ा ख़ातून हैं। वो घर से बाहर कभी अकेले नही निकलती हैं, नक़ाब पहनकर किसी को साथ लेकर ही निकलती हैं मगर हालात से मजबूर होकर घर से बाहर निकलना पड़ा।
जैसे ही उन्होंने सब्ज़ी बेचना शुरू किया उनकी दुकान चलने लगी। अब जिसको देखो वही उनसे सब्ज़ी ख़रीदने चला आता। वह जिस तरह, जितने रेट पर सब्ज़ी देतीं लोग ख़रीद लेते कोई मोल भाव नहीं करता। चूंकि वह नीयत की साफ थीं और ईमानदारी से सही सही तौल कर सही क़ीमत पर अपनी सब्ज़ी बेचती थीं इसलिये सब लोग उनसे सब्ज़ी ख़रीदने आने लगे। लेकिन लोगों में कानाफूसी चलती रहती कि सब उनकी खूबसूरती और ग्लैमर की वजह से उनके पास सब्ज़ी ख़रीदने आते हैं।
मुन्ने खाँ की मैय्यत में ज़्यादातर उनके ग्राहक ही उपस्थित थे जिनमें हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, जैन, सवर्ण, हरिजन आदि सभी बिरादरी के लोग आये हुये थे। बल्कि मुसलमान कम संख्या में नज़र आ रहे थे। सब लोग मुन्ने खाँ की ख़ूबियों को याद कर रहे थे। इसी तरह हर धर्म और बिरादरी की औरतें भी आयी हुई थीं और मुन्नी बेग़म को घेरे हुये थीं। मुन्नी बेग़म लगातार रोये जा रही थीं, सब उनको समझा रहीं थी मगर समझाते समझाते ख़ुद भी रोने लगती थीं।
क़मरून्निसा और कामना देवी भी जब उसके पास पहुँची तो कामना ने लपक कर उन्हें गले से लगा लिया और दहाड़ मार कर रोने लगीं। उनको देखकर दूसरी औेरतें भी दहाड़ मार कर रोने लगी। तभी मौलाना साहब ने ऐलान किया कि अब मैय्यत को देर तक रोकना ठीक नहीं। जब लोग जनाज़े को उठा कर चले तो बहुत लंबा जुलूस उनके साथ था।
दूसरे दिन तीजे की फातिहा थी। कामना देवी ने क़मरून्निसा से कहा, ’’जब आप तीजे की फातिहा में मुन्ने ख़ाँ के यहाँ जायें तो मुझे भी बुला लेना।’’
सुनकर क़मरून्निसा को बड़ा अचंभा हुआ। ’’आप तो तीजे की फातिहा के बारे में जानती हैं।’’
जब अचम्भित क़मरून्निसा के मुंह से ये शब्द निकले तो कामना देवी ने मुस्कराते हुये कहा, ’’मैं सब जानती हूँ। पहले तीजे की फातिहा तीसरे दिन होती थी। अब दूसरे दिन होने लगी है। रिश्तेदार व समाज के लोग मस्जिद में चने पर कलिमा पढ़ते हैं। जो लोग क़ुरान पढ़ना जानते है वो कुरान पढ़ के बख़्शवाते हैं।’’
क़मरून्निसा ताज्जुब से कामना देवी का चेहरा देखती रह गयीं। बोली ’’आपका तो जवाब नहीं। अभी मैं पूछूंगी तो आपके पास एक ही जबाब होगा ज़मीर साहब ने सिखाया है।’’ और दोनों हंस पड़ीं।
जब उनकी हंसी थोड़ी थमी तो कामना देवी एक थैले में से कपड़े निकाल कर बोलीं, ’’मैंने एक सलवार कुर्ती के सूट का कपड़ा मुन्ने खाँ की बीबी मुन्नी बेगम के लिये और एक उनकी बहू के लिये कल बाज़ार जाकर ख़रीद लिया था। एक-एक सूट पप्पू और उसके बेटे के लिये भी ख़रीद लाई हूं।’’
कपड़े देखकर क़मरून्निसा ख़ुश होकर बोलीं, ’’आपने बहुत अच्छा किया। चलिये हम लोगों को देर हो जायेगी।’’
रास्ते में क़मरून्निसा बोलीं, ’’आपकी आँखें व चेहरा देखकर ऐसा लग रहा है जैसे रात भर नहीं सोईं।’’
“हाँ आप ठीक समझ रहीं हैं। रात को मुन्नी बेगम को लेके मन्नू से बहस हो गयी। मुझे भी गुस्सा आता रहा, उन्हें भी, दोनों रात भर नहीं सो सके।’’
“मुन्नी बेगम को लेकर आप दोनों कल भी बहस कर रहे थे, ऐसी क्या बात है इन लोगों के बीच में। मैंने महसूस किया है कि मुन्नी बेगम का नाम सुनकर आप सनक जाती हैं।’’
क़मरून्निसा ने पूछा तो पहले कामना देवी ने बात को टालने की कोशिश की लेकिन जब ज़ोर देकर पूछा तो बताने को मजबूर हो गयीं। बोलीं, ’’जाने क्या बात है मुझे मन्नू के मुंह से मुन्नी बेग़म का नाम सुनकर तकलीफ होती है। मैंने कल उनसे कहा कि अब मुन्ने खाँ नहीं रहे। आप मुन्नी बेग़म के पास ज़्यादा मत जाना लोग उलटी सीधी बातें बनायेंगे, तो तुनक कर बोले कि मुन्ने खाँ के बच्चे अनाथ हो गये हैं। उनका कोई रिश्तेदार भी उनका साथ देने को तैयार नहीं है। अगर हम उनका ख़्याल नहीं करेंगे तो कौन रखेगा? बस इसी बात पर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने भी गुस्से में उल्टा सीधा बक झक दिया और उन्होंने भी।’’
कामना देवी की बात सुनकर कमरून्निसा बोली, ’’अभी तो मुन्नी बेगम तीन चार महीने किसी पराये मर्द से मिल ही नहीं सकती, इद्दत में रहेंगी।’’
“हाँ बाजी तुम सही कह रही हो। ज़मीर साहब भी बताया करते थे कि शौहर के मरने के बाद उसकी बीबी चार महीने तक घर के लोगों के अलावा किसी और के सामने नहीं आ सकती और न ही किसी मिल जुल सकती है।’’
कामना देवी बोली तो क़मरून्निसा बोली, ’’मानव कुमार जी भी तो ऐसे आदमी नहीं हैं कि उनकी नीयत पर शक किया जाये। वह तो इन्सानियत के नाते सबकी मदद करते हैं। आप बेकार में डरती हैं और बेकार लड़ाई लड़कर ख़ुद भी परेशान होती हैं और भाई साहब को भी परेशान करती हैं।’’
“ये तो तुम ठीक कह रही हो कम्मो बाजी, लेकिन अकेले हम परेशान नहीं हैं धर्म लाल गुप्ता, सरदार लखपत सिंह, दौलत खाँ ड्राईवर, डेविड सर और पप्पू यादव सभी के यहाँ मुन्नी बेगम को लेकर झगड़ा होता है। सारे मर्द उसी के यहाँ सब्ज़ी लेने जाते हैं एक-एक घंटे बातें मठोलते हैं।’’
कामना देवी की बात सुनकर क़मरून्निसा को हंसी आ गयी। बोली, ’’अरे यार आप लोग भी कैसी बातें करती हो। तुम भी तो मुन्ने खाँ का सब्ज़ी लेने के लिये इंतज़ार किया करती थीं। ये उन लोगों का कारोबार है। अपने धंधे के लिये वह लोग सबसे अच्छे से बोलते हैं इसलिये उन लोगों से सब लोग बात करते हैं। आप लोग बेकार परेशान होती हो।’’
कामना ने उनकी बात सुनकर कुछ नहीं कहा। ख़ामोशी से उनके साथ चलते हुये मुन्ने ख़ाँ के यहाँ पहुँच गयीं। रास्ते में क़मरून्निसा क्या क्या कहती रही उस पर भी ध्यान नहीं दिया।
जारी
ज़हीर ललितपुरी
साहित्यकार