समय की डोर से जकड़े मासूम बच्चे
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परिवार

समय की डोर से जकड़े मासूम बच्चे

स्कूल से आ गए बेटा? चलें! खाना खा लें, नमाज़ पढ़कर फिर ट्यूशन जाना है। अभी उस मासूम ने कंधे से भारी भरकम बैग उतारा ही था कि उसे तुरंत याद कराया गया कि उसे खाना खाते ही ट्यूशन जाना है। क्या आप जानते हैं कि न्यूरो साइंस में यह बात कही जाती है कि बच्चे के दिमाग में लॉक होने वाले आपके शब्द या ऑर्डर दरअसल इनपुट लॉकइन सिस्टम होता है, जो ब्रेन न्यूरॉन में लॉक होता है, वहीं से ब्रेन उस दृश्य को इनप्रिंट करके कनेक्ट करना शुरु कर देता है। 

आपने कहा ट्यूशन जाना है, इस शब्द में बच्चे के दिमाग में ट्यूशन का कल का दिन, ट्यूशन टीचर का चेहरा, उनका दिया हुआ होमवर्क आ गया और वह जो घर आकर रिलैक्स महसूस कर रहा था, तुरंत एक नए माहौल के लिए उसका दिमाग सोचने लगा। अभी वह स्कूल की घटनाओं पर सोचना चाहता था, अपनी मां से बताना चाहता था कि स्कूल में क्या क्या हुआ, उसे यह भी ख्याल था कि मां किस बात से खुश होती हैं, बस वही बातें बतायी जाएं, कुछ बातें छिपा दी जाएं, अपनी शरारतों का उल्लेख ना किया जाए, दूसरे ने परेशान किया, टीचर ने डांटा, बच्चों ने छेड़ा, उसने अपने दिमाग में सेटिंग कर ली थी। घर आकर बताना चाहता था लेकिन घर आकर बेदिली से सुना गया और ऑर्डर दे दिया गया नए टॉस्क का। 

कुछ देर के लिए आप स्वयं को उस बच्चे की जगह रखकर सोचिए कि अब वह ट्यूशन से लौटेगा तो आप उसे अरबी पढ़ने मदरसा भेज देंगी। वहां से लौटेगा तो उसे होमवर्क पूरा करने को बिठा देंगी। फिर वह आपकी इजाज़त से मोबाईल लेकर एक घंटा कुछ देखेगा या गेम खेलेगा। आप संतुष्ट हैं कि कितना अच्छा बच्चे का दिन गुज़र रहा है। 

हम पहले खुद कयास करें कि हम दिन भर काम खत्म करके थक जाएं और सोचें कि अब कुछ आराम कर लें तो तुरंत कोई नया काम आ पड़ता है और हम उस काम में बिज़ी हो जाते हैं। दिल में एक हूक उठती है कि फुर्सत जैसे नसीब में नहीं। हम आराम को तरसने लगते हैं और यही बात हमें अदर ही अंदर झुंझलाहट का शिकार बनाती है और बच्चों के सामने हम बयान नहीं कर पाते हैं, इसलिए आए दिन हम फट पड़ते हैं कि लगता है कुछ बेफिक्री नसीब हो, हम मौजूदा माहौल से बेज़ार होने लगते हैं। बस इसी तरह यह बच्चे भी सुकून भरा समय अपनी मर्ज़ी से नहीं गुज़ार पाते और झुंझलाहट, गुस्सा, बगावत का इज़हार करने लगते हैं।

याद रहे कि बच्चा जब फ्री होगा तभी वह रिलैक्स रहेगा, तभी अपनी मर्ज़ी से पढ़ेगा और क्वालिटी टाइम गुज़ारेगा और ज़्यादा सीखेगा। ज़बरदस्ती बंधा हुआ समय बच्चे की रचनात्मकता को उभरने का मौका नहीं देता, बस वह रुटीन फॉलो करता है लेकिन हाथ कुछ नहीं आता। इसलिए कोशिश यह होनी चाहिए कि बच्चे स्कूल में भी खूब खेलें, स्कूल स्पोर्टस के प्रबंध के सिलसिले में जागरुक रहिए और बच्चों को स्कूल में भी अपनी मर्ज़ी से समय गुज़ारने दीजिए, जितना वह अपनी मर्ज़ी से समय बिताते हैं, उतना ही वह अपने आपको समझने लगते हैं।

माता-पिता भविष्य की चिंता और दूसरों से प्रतिस्पर्धा के चक्कर में बच्चों को मजबूर करते हैं कि वे हर पल रुटीन में बंधे रहें, जबकि पढ़ाई के चार घंटे स्कूल में बिताने के बाद उसे इस्तेमाल में लाने के लिए बच्चों को आठ घंटे चाहिए, इसलिए उन्हें पढ़ी गई जानकारी का प्रयोग करने का समय दीजिए। आइए हम नीचे आपको मौजूदा माहौल में ट्यूशन क्लास के कल्चर की वास्तविकता से रुबरु कराते हैं कैसे यह कल्चर आपके मासूम बच्चे को जकड़ रहा है। 

कुछ अतीत में झाकें तो ऐतिहासिक घटनाएं, किस्से कहानियों या किताबों में नज़र आएगा कि ज्ञान बांटना इबादत समझा जाता था। दादी के नज़दीक बैठकर कहानी सुनें तो महसूस होगा कि गांव के गुरुजी हर बात जानने में मदद करते थे। जहां कहीं बच्चों की शिक्षा का महत्व समझा जाता, वहां के लोग बच्चों को पढ़ाने के लिए गुरु की व्यवस्था करते थे। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास समझा जाता था। 

फिर 1950 से 1970 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौर में शिक्षा को मकतब, मदरसों, खानकाहों और गुरुकुल से निकाल कर स्कूल में लाया गया, जहां शिक्षा का उद्देश्य सरकारी कामों के लिए नौकरशाही की तैयारी था। स्कूल धीरे धीरे आबाद होने लगे, लड़कों के साथ लड़कियों की शिक्षा सहज होने लगी। स्कूलों की भीड़ बढ़ने लगी और इसी शैक्षिक व्यवस्था को आज़ादी के बाद भी प्रोफेशनल उद्देश्य से जोड़ा गया और शिक्षा का उद्देश्य रोज़गार की प्राप्ति से इस हद तक जोड़ा गया कि हर इसांन खुद को नौकर बनाने और नौकरी करने की दौड़ धूप में आगे बढ़ने का सपना देखने लगा।

तरक्की के साथ शिक्षा का उद्देश्य जब कमाना बनता गया तो इंसान ने जीवन के हर क्षेत्र को केवल एक ही उद्देश्य से देखना शुरु किया। इसी उद्देश्य ने ग्रेड लाने की दौड़ को तेज़ कर दिया। यह सैलाब अब रुकने का नाम नहीं लेता, हर व्यक्ति अपने बच्चे को इस दौड़ में आगे कर रहा है, यहां तक कि कमाई के ज़रिए में पढ़ाना भी शामिल हो गया है। स्कूल में छात्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी ने शिक्षकों को लापरवाह बना दिया और शिक्षा पर ध्यान देना समाप्त हो गया। 

जिस कारण छोटे बच्चों (क्लास 1 से 8 तक, 6 से 14 साल के बच्चे) में ट्यूशन और कोचिंग का रुझान भारत में तेज़ी से बढता चला गया। 10 से 15 साल पहले तक यह कल्पना भी संभव नहीं थी कि 8 से 10 साल का बच्चा शाम को 3 से 4 घंटे ट्यूशन/कोचिंग में गुज़ारेगा, लेकिन आज दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, कोटा यहां तक कि छोटे शहरों में भी यह नियम बन चुका है।

माता-पिता की चिंता ने पर्सनल ट्यूशन और कोचिंग सिस्टम को एक इडंस्ट्री की शक्ल में खड़ा कर दिया है। शुरु में तो यह छात्रों के पढ़ाई के बोझ को कम करने का ज़रिया साबित हुआ। जो छात्र स्कूल में पीछे रह जाते, वह घर पर ट्यूशन लेने लगे। इस तरह मां-बाप ने बच्चों के लिए एक्स्ट्रा हेल्प ढूंढनी शुरु कर दी। और इस तरह मोहल्ले के ट्यूशन को व्यवस्थित करने के लिए कोचिंग के सफर का आगाज़ हुआ। 

हम यह भी कह सकते हैं कि 1970 से लेकर 1990 तक चयन परीक्षाओं की शुरुआत हुई। और यही वह मोड़ था जहां कोचिंग कल्चर ने अपनी जड़ें मज़बूत करना शुरु कर दी। महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान जैसेः IIT JEE, AIIMS, Medical Colleges, Civil Services, UPSC इन संस्थानों के स्तर को कॉमन पब्लिक स्कूल नहीं पहुंच सकते थे, इसलिए इसकी तैयारी करवाने के लिए फाउण्डेशन कोर्स शुरु होने लगे और स्थिति यह बनने लगी कि सीटें कम और उम्मीदवार लाखों में। चूंकि शुरुआत में जो छात्र इन स्तर तक पहुंच जाते उनकी लाइफस्टाइल बदल जाती और इस तरह सफलता व जीत का शार्टकट यह तरीका नज़रा आने लगा। यह स्लोगन कोचिंग इंस्टीट्यूट ने फैला दिया हम आपको जीत का शार्टकट देंगे देश में कोचिंग के द्वारा उच्च स्तरीय संस्थानों में पहुंचाने में कोटा, दिल्ली, मुखर्जी नगर, हैदराबाद और चेन्नई जैसी जगह मशहूर होने लगी।

निजीकरण (Privatisation) : 1990 के बाद निजीकरण को बढ़ावा दिए जाने के फलस्वरुप यह शिक्षा के क्षेत्र में गुल खिलाने लगा। मिडिल क्लास से ऊपर उठने का ख्वाब और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा ने निजीकरण को हवा देने का काम किया। इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस अब देश की ज़रुरत या प्रतिभा नहीं बल्कि स्टेट्स सिंबल बनने लगे और हर व्यक्ति यह सोचने लगा कि अगर सब कर रहे हैं तो हमारा बच्चा क्यों नहीं कर सकता? नतीजा यह हुआ कि कोचिंग अब ज़रुरत नहीं, सामाजिक दबाव बन गई। इसी भीड़ में अब बच्चे के जन्म के बाद अभिभावक इंडस्ट्री खड़ा करने वाले लोगों के लिए अपने बच्चों को लेबर मज़दूर बनाने का ख्वाब देखने लगे।

  • जारी

डॉक्टर खान मुबश्शरा फिरदौस

संपादक, हादिया-ई-मैग्ज़ीन

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