ईद और सामाजिक भाईचारा
ईद का पर्व
दुनियाभर के मुसलमान लगातार 29 या 30 दिनों तक अल्लाह की इबादत में लगे रहते हैं और रोजे रखते हैं। रमज़ान के 29 या 30 रोज़े मुकम्मल होने के बाद सूर्यास्त के समय बच्चों से लेकर बड़ों तक और महिलाओं से लेकर पुरुषों तक सबकी निगाहे आसमान की ओर टिकी होती है। शव्वाल (अरबी का 10वां महिना) यानी ईद का चांद नजर आते ही पूरे मुस्लिम समाज मे नई खुशी की एक लहर दौड़ जाती है और अगले दिन पूरे एहतेमाम और धूमधाम से ईद मनाई जाती है। यह एक पारंपरिक जश्न नही है बल्कि एक ऐसा त्यौहार है जिसमे इस्लामी मूल्यों का प्रतिबिंब नजर आता है। यह त्यौहार न सिर्फ इबादत और अल्लाह का शुक्र अदा करने का दिन है, बल्कि ईद भाईचारा, मोहब्बत, वहदत (एकता) और खुशियों का संदेश लेकर आती है। यह मुसलमानों का सबसे बड़ा त्यौहार है, जिसे मीठी ईद भी कहते हैं। “हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ मदीना में तशरीफ़ लाए और वहाँ के लोगों के यहाँ दो दिन ऐसे थे जिनमें वे खेल-कूद किया करते थे। आपने पूछा: “यह दो दिन क्या हैं?” उन्होंने कहा कि हम दौर-ए-जाहिलियत (अज्ञानता काल) में इन दिनों में खेल-कूद किया करते थे। तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “बेशक अल्लाह तआला ने तुम्हें इनके बदले इनसे बेहतर दो दिन अता किए हैं, यौम-ए-अज़्हा (कुर्बानी का दिन) और यौम-ए-फ़ित्र (ईद-उल-फ़ित्र का दिन)।” (अबू दाऊद 1134) ईद की वास्तविकता दुनिया में फैले अनेक फ़ितनों और बिगाड़, सांप्रदायिक भेदभाव,ऊँच नीच और जातिगत व्यवस्था के पीछे नफ्स की अतिरिक्त इच्छाएँ मुख्य कारण हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अल्लाह तआला ने हमारे नफ़्स को हमारी सवारी बनाया है; इसलिए हमें उस पर सवार होकर अपनी वास्तविक मंज़िल की ओर आगे बढ़ना है। यह वास्तविक मंज़िल क्या है? यह स्वर्ग की प्राप्ति और अपने पालनहार की प्रसन्नता के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में उसकी की इबादत और उसकी आज्ञापालन है। जो आत्म संयम के बगेर संभव नहीं है। लगभग 30 दिनों तक बंदा अल्लाह की प्रसन्नता के लिए केवल हराम ही नहीं, बल्कि निर्धारित समय के लिए हलाल चीज़ों से भी दूर रहता है। इबादतो और भूख प्यास की तकलीफ सहन करता है। जैसे विभिन्न देश अपनी सेनाओं को या कॉर्पोरेट कंपनिया अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षण देते हैं, वैसे ही अल्लाह रब्बुल आलमीन रमज़ान के माध्यम से अपने बंदों को नफ़्स पर नियंत्रण पाने की ट्रेनिंग देता है, ताकि वे पूरी ज़िंदगी हराम से बच सकें और अल्लाह द्वारा दी गई स्पष्ट शिक्षाओं के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकें। रमज़ान का महीना आत्मसंयम और नफ़्स पर काबू पाने की श्रेष्ठ व्यवस्था है। इस तरह से देखें तो ईदुल फ़ितर का त्योहार अपने नफ़्स (इच्छाओं) पर विजय का उत्सव है। जो अल्लाह रब्बुल आलमीन अपने बंदों को इनाम के रूप में प्रदान करता है। अल्लाह के प्रति समर्पण और प्रेम के बिना समाज मे भाईचारा संभव नहीं है। क्योंकि यह दृष्टिकोण मानवों से प्रेम करना सिखाता है। ईद की महिमा यह त्यौहार अपने अंदर एक विशेष और अनोखी शान रखता है। दुनिया में अन्य जातियाँ जो त्यौहार मनाती हैं, उनके पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक कारण होता है। कोई त्यौहार जीत की खुशी में मनाया जाता है, तो कोई किसी महान व्यक्तित्व के जन्मदिन की याद में। लेकिन ईदुल फ़ितर की शान इन सबसे बिल्कुल निराली है। ईद के दिन जो रीति-रिवाज अपनाए जाते हैं, वे अन्य जातियों से पूरी तरह अलग हैं। इस दिन न तो पटाखे फोड़े जाते हैं, न डांस पार्टियाँ और नाच गाना होता हैं और न ही अनावश्यक शोर-शराबा किया जाता है। इसके बजाय, एक मोमिन शुक्राने की नमाज़ अदा करने के लिए सुबह-सुबह “अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर वलिल्लाहिल हम्द” के नारे के साथ ईदगाह की ओर रवाना होता है। यह नारा सिर्फ ईश्वर के मात्र एक होने की घोषणा नहीं करता बल्कि इस अवधारणा पर पूरी मानवता को एक लड़ी मे पिरोने का स्पष्ट उदाहरण है। नमाज़ ए ईद का संदेश नमाज़ के दौरान लोग एक समान कतार में खड़े होते हैं। यहाँ कोई वी.आई.पी. लाइन नहीं होती और न ही जाति-बिरादरी या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव होता है। सभी एक ही कतार में खड़े होते हैं। जिसे जहाँ जगह मिलती है, वहीं खड़ा होकर अल्लाह की बारगाह में सिर झुका देता है। कितना सुंदर दृश्य होता है! अमीर हो या ग़रीब, काला हो या गोरा, वृद्ध हो या युवा, छोटा हो या बड़ा सभी एक ही कतार में खड़े होते हैं। यह दृश्य इस्लाम की समानता का जीवंत प्रतीक है। रंग-बिरंगे वस्त्रों में वे बाग़ के फूलों जैसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं। कुरआन मे अल्लाह फरमाता है, “ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में इसलिए बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। निश्चय ही अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे अधिक सम्मानित वह है जो सबसे अधिक परहेज़गार (आत्मसंयम) है। निस्संदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है।( अल-हुजुरात -13) इसी को स्पष्ट करते हुए हज्जतुल विदा के ऐतिहासिक अवसर पर हजरत मुहम्मद स.अ.व ने इस्लाम के बुनियादी मानवाधिकार, समानता और सामाजिक न्याय की जो घोषणा की थी उसने नस्ल, रंग, जाति, भाषाकीय, प्रांत पर आधारित भेदभाव का अंत कर दिया था। आप स.अ.व ने फ़रमाया: “किसी अरब को अजमी पर, किसी अजमी को अरब पर, किसी गोरे को काले पर और किसी काले को गोरे पर कोई श्रेष्ठता नहीं, सिवाय तक़वा के।” गले लगाने की रस्म लगा लिया उन्हें सीने से जोश-ए-उल्फ़त में ग़रज़ कि आ ही गया मुझ को प्यार ईद के दिन नमाज़ के बाद लोग एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद देते हैं, अपने हो या गैर गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से मिलते हैं और दिलों को जोड़ते हैं। ईद का दिन दुश्मनी को दोस्ती में बदलने का उत्तम अवसर है। जिनसे संबंधों में कड़वाहट आ गई हो, वे भी इस दिन रिश्तों को फिर से सुधार सकते हैं। इस तरह समाज मे भाईचारे की बहार आती है। खुशियों मे गरीबों को शामिल रखना लेकिन सिर्फ खुशी मनाना ही ईद का मतलब नहीं होता है, बल्कि ईद का मतलब दूसरों के साथ खुशियां बांटना भी है। इसी लिए इस दिन गरीब रिश्तेदारों, जरूरतमंदों, बेवाओं और अनाथों को फितरा दिया जाता है। यह भी रोजो की शुद्धिकरण के लिए एक तरह का दान है। हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने सदक़ा-ए-फ़ित्र को फ़र्ज़ क़रार दिया, ताकि रोज़े को लग़्व (बेकार बातों) और बेहूदा अक़वाल व अफ़आल से पाक किया जा सके और मिस्कीनों को खाना मिल सके। चुनाँचे जिसने इसे नमाज़ (ईद) से पहले अदा कर दिया, तो यह ऐसी ज़कात है जो क़बूल कर ली गई; और जिसने इसे नमाज़ के बाद अदा किया, तो यह आम सदक़ात में से एक सदक़ा है। ( अबूदाऊद 1609) सामान्य रूप से समाज मे धनवान और गरीबों के बीच एक दूरी होती है इससे उनके बीच एक सेतु का निर्माण किया जाता है ताकि समाज मे प्रेम और भाईचारा पेदा किया जा सके। ईद की रस्मों मे कहीं उसका वास्तविक संदेश शायद आज गुम हो गया है इसीलिए किसी कवि ने कहा है, जो खो गया हम से अंधेरी रातों में उसी को ढूंढने के लिए ईद आई है। इस प्रकार ईदुल फ़ितर केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि रमज़ान के प्रशिक्षण का परिणाम, आत्मसंयम का इनाम,अल्लाह का आभार व्यक्त करने और भाईचारे का दिन है।
शकील अहमद राजपूत
पत्रकार व लेखक, गुजरात