धर्म का राजनीतिक उपयोग: आस्था से सत्ता तक
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राजनीति

धर्म का राजनीतिक उपयोग: आस्था से सत्ता तक

आस्था का मंच, राजनीति की रणनीति

हाल के वर्षों में भारतीय चुनावी रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में धार्मिक प्रतीकों, नारों और अनुष्ठानों की बढ़ती उपस्थिति ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है—क्या धर्म केवल सांस्कृतिक पहचान का माध्यम है, या वह मात्र सत्ता प्राप्ति की रणनीति है? चुनाव आयोग की विभिन्न रिपोर्टों और निगरानी संगठनों के विश्लेषण से यह संकेत मिलता है कि चुनावी भाषणों में धार्मिक अपीलों और सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल पहले की तुलना में अधिक होने लगा है।

भारत में धर्म हमेशा से समाज की नैतिक संरचना का भाग रहा है। लेकिन जब आस्था को राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बना लिया जाए, तो वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बन जाती है। भारतीय गणराज्य का मूल विचार यह था कि राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखे और नागरिकता का आधार आस्था नहीं बल्कि समान अधिकार और क़ानून का शासन हो।

यहाँ हम इसी द्वंद्व को समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ धर्म व्यक्तिगत आस्था और सांस्कृतिक पहचान के रूप में सम्मानित है, वहीं उसका राजनीतिक उपयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को कैसे प्रभावित करता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान परिदृश्य, संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक प्रभावों की पड़ताल करते हुए यह विमर्श इस सवाल की ओर भी देखेगा कि क्या भारत अपनी बहुलतावादी परंपरा को पुनः सुदृढ़ कर सकता है?

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: धार्मिक राजनीति की जड़ें

औपनिवेशिक काल में “फूट डालो और राज करो” की नीति ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आधार बना दिया। अलग निर्वाचन क्षेत्र, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और जनगणना के माध्यम से ब्रिटिश शासन ने धार्मिक विभाजन को संस्थागत रूप दिया। परिणामस्वरूप साम्प्रदायिक तनाव बढ़े और अंततः विभाजन की त्रासदी सामने आई।

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रीय एकता का आधार माना। गांधी ने धर्म को नैतिक शक्ति के रूप में देखा, जबकि नेहरू ने आधुनिक राष्ट्र-राज्य के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धार्मिक निरपेक्षता पर जोर दिया। संविधान सभा में भी यह स्पष्ट था कि विविध आस्थाओं वाले देश में लोकतंत्र तभी टिकेगा जब राज्य किसी एक धर्म का पक्ष न ले।

स्वतंत्रता के बाद संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई। लेकिन समय के साथ कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों ने धार्मिक पहचान को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस एक ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसने धार्मिक भावनाओं को सीधे चुनावी राजनीति से जोड़ दिया। इसके बाद धर्म केवल लोगों की आस्था तक सीमित नहीं रहा बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रभावी साधन बन गया।

संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी थी—बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र को कमज़ोर कर सकता है। उनका उद्देश्य एक ऐसा राष्ट्र बनाना था जहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समान नागरिकता लोकतांत्रिक स्थिरता की आधारशिला बने।

समकालीन परिदृश्य: आस्था से चुनावी शक्ति तक

आज चुनावी अभियानों में धार्मिक प्रतीकों और भावनात्मक — बल्कि भड़काऊ — अपीलों और नारों का इस्तेमाल एक सामान्य रणनीति बन चुका है। कभी बहुसंख्यक पहचान की राजनीति तो कभी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप—दोनों ही लोकतांत्रिक विमर्श को नीति और विकास के मुद्दों से हटाकर पहचान आधारित बहसों की ओर ले जाते हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और अन्य निगरानी संस्थाओं ने चुनावों के दौरान नफ़रत भरे भाषणों और सांप्रदायिक बयानबाजी में वृद्धि की ओर ध्यान दिलाया है।

पिछले दिनों नीतिगत स्तर पर भी कुछ क़ानून और प्रस्ताव धार्मिक संदर्भों के साथ सामने आए हैं—जैसे धर्मांतरण विरोधी विधेयक या नागरिकता से जुड़ी बहसें। सत्ता-समर्थकों का तर्क है कि ये क़ानून सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना कमज़ोर हुई है।

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर दिया है। वायरल वीडियो, संपादित भाषण और भ्रामक सूचनाएँ धार्मिक भावनाओं को उकसाने का माध्यम बन गई हैं। एल्गोरिदम आधारित प्लेटफॉर्म अकसर सनसनीख़ेज़ सामग्री को बढ़ावा देते हैं, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण और अधिक गहरा होता है।

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। विभिन्न देशों में राष्ट्रवाद के उदाहरण दिखाते हैं कि जब सत्ता द्वारा धर्म का दुरुपयोग किया जाता है तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ प्रभावित होती हैं। इन वैश्विक अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को बचाए रखना केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है।

संवैधानिक सुरक्षा और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर दबाव

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” (अब पंथनिरपेक्ष) शब्द केवल प्रतीकात्मक नहीं है, यह राज्य की नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत है। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं, लेकिन साथ ही राज्य को किसी धर्म विशेष का पक्ष लेने से रोकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में इन सिद्धांतों को मज़बूत किया है। 1973 का केशवानंद भारती मामला इस बात की पुष्टि करता है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, जिसे बदला नहीं जा सकता। इसी तरह चुनावी क़ानूनों के तहत धार्मिक अपीलों को सीमित करने के प्रयास भी हुए हैं।

फिर भी चुनौतियाँ अब भी खड़ी हुई हैं। कभी राज्य द्वारा धार्मिक आयोजनों के लिए वित्तीय सहयोग, कभी धार्मिक पहचान के आधार पर नियुक्तियाँ ये धर्म के राजनीतिक उपयोग के स्पष्ट उदाहरण हैं जो धीरे-धीरे लोकतंत्र की निष्पक्षता को प्रभावित करते जा रहे हैं। जब शासन धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करने लगता है, तो यह संदेश जाता है कि नागरिकता का दर्जा आस्था के अनुसार बदल सकता है।

इस संदर्भ में चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, जो सामान्यत: दिखाई नहीं देती। यदि धार्मिक अपीलों और घृणास्पद भाषणों पर सख़्ती से रोक न लगे, तो चुनावी प्रक्रिया का निष्पक्ष चरित्र कमज़ोर हो जाता है।

लोकतंत्र पर प्रभाव: विश्वास का क्षरण और सामाजिक ताना-बाना

धार्मिक राजनीति का सबसे बड़ा असर समाज की एकता पर पड़ता है। सांप्रदायिक तनाव और नफरत से जुड़े अपराधों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक ध्रुवीकरण अक्सर सामाजिक विभाजन को जन्म देता है। अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना और बहुसंख्यक समुदायों में भय का वातावरण लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं है।

संस्थागत स्तर पर भी इसका प्रभाव दिखता है। जब संसद या राज्य विधानसभाएँ धार्मिक मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाती हैं, तो नीति निर्माण और विकास संबंधी बहसें पीछे छूट जाती हैं। कार्यपालिका का अति-सक्रिय हस्तक्षेप और विधायी बहुमत का उपयोग भी कभी-कभी धर्मनिरपेक्ष संतुलन को कमज़ोर कर देता है।

मतदाताओं की स्वतंत्रता पर भी इसका असर पड़ता है। जब चुनाव पहचान की लड़ाई बन बन जाते हैं, तो नागरिक मुद्दों पर आधारित निर्णय लेने के बजाय भावनात्मक अपीलों के आधार पर वोट देने लगते हैं। इससे लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता घटती है और राजनीति विचारधारा के बजाय धार्मिक पहचान पर केंद्रित हो जाती है।

फिर भी उम्मीद की किरणें मौजूद हैं। कई नागरिक संगठनों और अंतरधार्मिक पहलों ने सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए काम किया है। स्थानीय स्तर पर ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ विभिन्न धर्मों के लोग मिलकर सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं और संविधान की मूल भावना—बंधुत्व—को जीवित रखते हैं। कुछ सामाजिक संस्थाएं, जैसे जमाअते इस्लामी हिन्द, ‘धार्मिक जन-मोर्चा’, ‘फोरम फॉर डेमोक्रेसी एंड कम्यूनल एमिटी’, कुछ चर्च, मस्जिदें आदि भी सर्व धर्म आयोजन करते हैं, जिससे देश में धार्मिक/वैचारिक सह-अस्तित्व की भावनया को बल मिलता है। 

आगे की राह: धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की पुनर्प्राप्ति

भारत का लोकतंत्र अपनी विविधता और सह-अस्तित्व की परंपरा के कारण अनूठा है। इसे मज़बूत करने के लिए कुछ ठोस क़दम आवश्यक हैं। सबसे पहले, चुनावी सुधारों के माध्यम से धार्मिक अपीलों और घृणास्पद भाषणों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। नागरिक शिक्षा कार्यक्रमों में संविधान के मूल्यों—समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता—को प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए।

राजनीतिक नेतृत्व को भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। यदि नेता विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दें और धार्मिक पहचान को निजी क्षेत्र तक सीमित रखें, तो लोकतांत्रिक संस्कृति मजबूत होगी। अब कुछ ही राज्यों में स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर पर धर्मनिरपेक्ष मॉडल देखने को मिलते हैं, जहाँ नीति निर्णय धार्मिक विभाजन के बजाए सामुदायिक हितों पर आधारित होते हैं। पर कब तक?

नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मतदाता यदि भावनात्मक अपीलों के बजाय नीति और कार्य-प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लें, तो राजनीति का स्वरूप बदल सकता है। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिक चेतना से जीवित रहता है।

फिर भी निराश होने की ज़रूरत नहीं है। भारत का इतिहास बताता है कि विभाजन और ध्रुवीकरण के बावजूद देश ने बार-बार लोकतांत्रिक रास्ता चुना है। आज भी वही विकल्प सामने है—क्या धर्म सत्ता का उपकरण बनेगा या नैतिक मार्गदर्शक? संविधान की प्रतिबद्धता और समाज की बहुलतावादी चेतना ही इस प्रश्न का उत्तर तय करेगी।

अंततः, यह सवाल हर नागरिक से जुड़ा है: क्या हम आस्था को नैतिक उत्थान का माध्यम बनाएंगे, या उसे राजनीतिक ध्रुवीकरण औज़ार बनने देंगे? 


भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इसी निर्णय पर निर्भर करता है।

डॉ. मुहम्मद इक़बाल सिद्दीक़ी

वरिष्ठ लेखक, नई दिल्ली

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