मेरा पहला रोज़ा
मेरा प्यारा रमज़ान
अंशरा शोएब, कराड
मेरा नाम अंशरा शोएब है और मैं कराड शहर में रहती हूँ। इस साल मैंने बड़े शौक से रोज़ा रखा। सहरी में अम्मी की प्यार भरी आवाज़ पर उठना और परिवार के साथ बैठना मुझे बहुत अच्छा लगा। थोड़ी घबराहट थी, लेकिन खुशी उससे ज़्यादा थी।
दिन में कभी-कभी भूख-प्यास लगती। रसोई की खुशबू से कुछ खा लेने का मन करता, लेकिन तुरंत याद आ जाता कि अल्लाह मुझे देख रहे हैं, इसलिए मैं सब्र करती रही। दादी-दादा कहानियाँ सुनाकर मुझे बहलाते रहे।
दोपहर में अम्मी ने मेरे हाथों पर सुंदर मेहंदी लगाई, मेंहदी का रंग ऐसा चढ़ा कि मैं उसे देखकर खुश हो गई। शाम से पहले मैं अम्मी-अब्बू के साथ बाज़ार गई जहां उन्होंने मुझे नए कपड़े दिलाए। उन्हें पहनकर और हाथों में फूलों की माला सजाकर मुझे बहुत मज़ा आ रहा था, बहुत स्पेशल फील हो रहा था।
रोज़ा रखने की वजह से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। जब मैंने रोज़ा रखकर खिड़की से आम के पेड़ पर बैठे पंछियों को देखा तो उनकी प्यास का एहसास हुआ और मैंने तुरंत उनके लिए पानी का कटोरा रख दिया।
इफ़्तार का इंतज़ार खास था। अज़ान सुनते ही दिल खुशी से भर गया। नाना-नानी का तोहफ़ा और अम्मी-अब्बू के साथ दुआ करना मेरी सबसे प्यारी यादें बन गईं। यह दिन मुझे सब्र, शुक्र और प्यार सिखा गया।
मेरा पहला रोज़ा: एक नया अहसास और अल्लाह का शुक्र
इनाया हिरा खान, सीकर, राजस्थान
"मेरा पहला रोज़ा... यह मेरे लिए सिर्फ सुबह से शाम तक भूखा रहने का नाम नहीं था, बल्कि खुद को आज़माने और अपनी रूह को पहचानने का एक खूबसूरत जरिया था। सच कहूँ तो, शुरू में थोड़ा डर था कि क्या मैं कर पाऊँगी? लेकिन जैसे-जैसे दिन गुज़रा, मुझे अपने अंदर एक अनोखी ताकत महसूस होने लगी।
जब दोपहर की धूप में मुझे प्यास और भूख का अहसास हुआ, तो मेरा ध्यान उन लोगों की तरफ गया जिनके पास शायद रोज़ाना भरपेट भोजन नहीं होता। मुझे पहली बार उनके दर्द का असली अहसास हुआ। मेरे नन्हे से दिल में यह बात बैठ गई कि इंसानियत और हमदर्दी क्या होती है। अल्लाह ने मुझे जो कुछ भी दिया है, आज मुझे उसकी असली कीमत समझ आई।
जब शाम होने वाली थी और हम सब इफ़्तारी के दस्तरख्वान पर बैठे, तो मेज़ पर सजी हर चीज़—वो खजूर, वो ठंडा पानी—सब कुछ कितना कीमती लग रहा था! उस वक्त मुझे समझ आया कि अल्लाह की दी हुई नेमतों के प्रति 'शुक्र' जताने का असली मतलब क्या है। रोज़ा रखना सिर्फ प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने नफ़्स (मन) पर काबू पाने और अल्लाह के और करीब होने का एक प्यारा सा रास्ता है।
मैंने पूरे दिन न केवल संयम रखा, बल्कि हर काम एक प्यारी सी मुस्कान के साथ किया। मुझे आज खुद पर गर्व है कि मेरा इरादा नेक और मज़बूत था। वाकई, जब हम दिल से कुछ करने की ठान लें और अल्लाह की मदद साथ हो, तो दुनिया की कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं लगती। यह रोज़ा मेरे लिए एक सबक है—मोहब्बत का, सब्र का और शुक्रगुज़ारी का।"
मेरा पहला रोज़ा, एक यादगार अनुभव
अनशरह औसाफ कुरैशी, औरंगाबाद, महाराष्ट्र
मेरा पहला रोज़ा मेरे जीवन का बहुत ही सुंदर और यादगार अनुभव रहा। जब मैं सहरी के लिए उठी तो मन में उत्साह था और ऐसा लगा कि रोज़ा रखना बहुत आसान है। फज्र की नमाज़ पढ़कर जब दोबारा सोयी तो नींद बहुत सुकून भरी लगी। सुबह 11 बजे उठी तो खेल-कूद में मन लग गया और समय अच्छे से बीत गया। ज़ुहर की नमाज़ भी अदा की।
लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता गया, पेट में भूख और प्यास का एहसास होने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे घड़ी रुक गई हो और समय ठहर गया हो। अस्र की नमाज़ पढ़ी, पर प्यास से दिल थोड़ा बेचैन था। मम्मा इफ्तार की तैयारी में लग गईं और अब्बू मुझे हिम्मत देते रहे। उनकी बातों से समय जल्दी बीत गया।
घर की सफाई और फलों की तैयारी में मेरा भी मन लग गया। जब नानू, नन्ना, फूफी, खाला और सब भाई-बहन आए तो खुशी दोगुनी हो गई। नानू ने दुआ कराई, कुरआन की आयतें पढ़ीं और सबके लिए दुआएँ कीं। देखते ही देखते रोज़ा खुल गया और दिल खुशी से भर गया।
अल्लाह हमे देख रहा है इस बात का अहसास हुआ मुझको
अल्लाह हमारे साथ है।
ह्म बुरे कामों से बचते रहेंगे इन्शाअल्लाह।
मेरा पहला रोज़ा बेहद यादगार रहा
ज़रनीश शेख़, अहमदाबाद, गुजरात
मेरा नाम ज़रनीश शेख है और मैं पांच साल की हूं। मेरा पहला रोज़ा मेरे लिए बहुत ही ख़ास रहा। पूरा दिन मेरे लिए खुशियों भरा साबित हुआ हां थोड़ा मुश्किल भी था। मैं इतनी उत्साहित थी कि सेहरी के लिए एक घंटा पहले ही उठ गई। मैंने सुन्नत के अनुसार हेल्दी खाना खाया और दिल ही दिल बहुत खुश थी कि मैं भी रोज़ा रख रही हूं। आधा दिन आसानी से गुज़र गया, लेकिन बाद में मुझे प्यास लगी। तब मुझे मम्मी की सिखाई हुई रोज़े की अहमियत याद आयी। मैंने अल्लाह की खुशी के लिए सब्र किया और हिम्मत नहीं हारी। थोड़ी देर झपकी लेकर आराम कर लिया। पापा फूल और मिठाईयां लेकर आए और सब घर वालों ने तोहफे और ढेर सारा प्यार दिया।
यह दिन मुझे हमेशा याद रहेगा
इफ़ा चौहान, सीकर राजस्थान
आज मेरा पहला रोज़ा था और मैं बहुत उत्साहित थी। सुबह से ही मैंने अपने रोज़ा रखने की तैयारी कर ली थी। मम्मी ने मुझे बताया था कि रोज़ा अल्लाह को पसंद है और यह हमें सब्र करना सिखाता है। दिन भर मुझे थोड़ी भूख लगी और प्यास भी, लेकिन मैंने अपना रोज़ा पूरा किया। मम्मी ने कहा था कि रोज़ा रखने से हमारा दिल और दिमाग मज़बूत होते हैं। शाम को रोज़ा खोलने के बाद, मुझे एक अलग ही खुशी मिली, जैसे मैंने कुछ स्पेशल अचीव किया हो। आज का दिन मुझे याद रहेगा और मैं अगली बार भी रोज़ा पूरा रखना चाहती हूं।
दुआ करें कि अल्लाह मुझे आगे भी रोज़ा रखने की हिम्मत दें
उमर कुरैशी, झलवर, राजस्थान
मेरा नाम उमर कुरैशी है, मैं पांच साल का हूं। मैंने इस साल दूसरे रमज़ान को अपना पहला रोज़ा रखा। मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया जबकि मेरे भाई मेरे सामने चीज़ और चाय पी रहे थे फिर भी मैंने कुछ नहीं खाया और यह तय कर लिया कि मैं आज रोज़ा पूरा करूंगा। मुझे नमाज़ पढ़ना नहीं आता लेकिन फिर भी मैंने कुछ दुआ पढ़ी और दिन में सो गया क्योंकि मैं सेहरी करके सोया नहीं था।
शाम हुई अस्र के समय मुझे भूख लगी और मैं मम्मी से खाना मांगने लगा और इफ्तारी का सामान देखकर ज़िंद करने लग गया। मम्मी ने मुझे समझाया और फिर मैं चुपचाप इफ्तारी बांटने की तैयारी में लग गया और फिर रिश्तेदारों में इफ्तारी बांटने चला गया। मगरिब की अज़ान सुनकर मैंने अपना रोज़ा खोला। रोज़ा रखने के लिए मुझे ढेर सारे पासे मिले और इस तरह मेरा पहला रोज़ा पूरा हुआ।
निदा फातिमा, अहमदाबाद, गुजरात
मेरी बेटी का पहला रोज़ा
आज मेरी प्यारी बेटी ने अपना पहला रोज़ा रखा। सहरी के लिए वो खुद ही उत्साह से उठ गई। नींद तो आ रही थी, लेकिन चेहरे पर खुशी और गर्व साफ़ दिख रहा था। दिन में थोड़ी थकान भी हुई, मगर उसने सब्र से काम लिया।
जब इफ़्तार का वक्त करीब आया तो उसकी आँखों में अलग ही चमक थी। अज़ान होते ही उसने दुआ के लिए हाथ उठाए और खजूर से रोज़ा खोला। उस पल मेरा दिल खुशी और शुक्र से भर गया।
अल्लाह तआला उसका ये पहला रोज़ा क़बूल फरमाए और उसे हमेशा दीन पर क़ायम रखे। आमीन!
मेरा पहला रोज़ा
शिज़ा फ़ातिमा, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मेरा नाम शिज़ा फ़ातिमा है मैं 7 वर्ष की हूं।
आज मैंने अपनी ज़िंदगी का पहला रोज़ा रखा। स्कूल में बहुत प्यास लगी, बार-बार मन हुआ कि थोड़ा पानी पी लूँ, लेकिन फिर मैंने खुद को समझाया कि अगर मैंने पानी पी लिया तो अल्लाह तआला नाराज़ हो जाएंगे, इसलिए मैंने सब्र किया। जब मेरी छोटी बहन ख़ाना का रही थी तो मुझे भी बहुत खाने का मन हुआ, पर मुझे अम्मी की बात याद आ गई कि रोज़े में कुछ नहीं खाते-पीते। थोड़ा कमजोर महसूस हुआ, फिर भी मैं खुश थी कि मैं रोज़ा रख पा रही हूँ। स्कूल से घर आकर मैंने नमाज़ पढ़ी और अल्लाह से दुआ की कि मेरा रोज़ा कबूल हो। इफ़्तार के वक़्त जैसे ही रोज़ा खोला, मुझे बहुत सुकून और खुशी महसूस हुई कि मैंने अपना पहला रोज़ा पूरा कर लिया।
मेरा पहला रोज़ा
निज़ालिया फ़ातिमा, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मेरा नाम निज़ालिया फ़ातिमा है मैं 8 वर्ष की हूं। मैंने इस साल पहली बार रोज़ा रखा और मुझे खुद पर बहुत गर्व हो रहा है। दिन में भूख और प्यास लगी, लेकिन मैंने अपने आप को रोका कि अल्लाह बहादुर बच्चों से खुश होते हैं मैं रोज़ा पूरा करूंगी।
शाम होने लगी तो मुझे मुख सताने लगी प्यास लग गई पर मुझे सब्र था।हिम्मत स्कूल में जब सब सहेलियाँ टिफ़िन खाने बोल रही थीं तो मैंने मना कर दिया कि मैं नहीं खाऊंगी मैं रोज़ा हूं मैंने उन्हें बताया कि मैं रोज़े में हूँ और आज कुछ नहीं खाऊँगी। मुझे ऐसा लगा मेरा पेट भूख से अंदर हो गया है पर मैंने शिकायत नहीं की। घर आकर मम्मी के साथ नमाज़ पढ़ी और दुआ माँगी कि अल्लाह मुझे अच्छा बच्चा बनाए। इफ़्तार के समय मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था—रोज़ा खोलते ही मुझे लगा कि मैंने अपनी छोटी-सी उम्र में एक बहुत बड़ा काम कर लिया।
ज़ैनब, झांसी, उत्तर प्रदेश
मेरी ज़ैनब का पहला रोज़ा
रमज़ान का तीसरा दिन था मैंने अपनी बड़ी बहन को फ़ोन किया तो उन्होने बताया कि जैनब भी आज रोजा रख रही है! ये सुन कर हम सब बहुत खुश हुए, जैनब अभी सिर्फ सात साल की है इतनी छोटी बच्ची रोजा रख पाएगी या नहीं मैंने सोचा, मैंने उसे यहाँ (नानी के घर) आने को कहा! तकरीबन 12 बजे वो अपने अब्बू और अपने छोटे भाई के साथ अपनी नानी के घर आ गई, वो बहुत खुश थी मैंने पूछा-"ज़ैनब भूख तो नहीं लग रही है" उसने खुश होते हुए कहा -"बिल्कुल नहीं खाला"!ज़ैनब ओर बच्चों के साथ खेलने लगी.बच्चों को खाते पीते देख रही थी पर अल्हम्दुलिल्लाह उसने रोजा नहीं तोड़ा! हमने ज़ोहर, असर और मगरिब की नमाज़ साथ पढी ! शाम के 4 बजे ज़ैनब का मुँह उतने लगा , बार-बार कहने लगी 'खाला भूख लग रही है' हम सब उसे समझने लगे कि ज़ैनब बस दो घंटे ही बचे हैं अब वो किचन में जा कर भजियों, फलो को हसरत से देखती है, मुझे डर लगा की कहीं खा ना ले पर अल्हम्दुलिल्लाह उसने खाया नहीं, उसने बड़ी मासूमियत से कहा "खाला बड़ी मुश्किल का रोजा है" ये सुन कर मैं हसने लगी, मैंने उसे कहा कि अल्लाह बहुत खुश होंगे तुमसे, हम सब भी तुम्हे इनाम देंगे रोजा रखने का, बस अपना रोजा पूरा कर लो! पापा ने उसे फूलों का हार पहनाया, जब इफ्तार का वक्त हुआ तो ज़ैनब को खाने के लिए कहा तो उसने ख़ुशी से कहा "सच में खा ले" हमने कहा-हाँ अब खा सकते है!
अल्हम्दुलिल्लाह मेरी ज़ैनब ने अपना पहला रोज़ा पूरा किया!
बुशरा अजीज़ (ख़ाला)