ईदुलफित्र : बड़ाई और शुक्रगुजा़री का दिन
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दिव्य ज्योति

ईदुलफित्र : बड़ाई और शुक्रगुजा़री का दिन


अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीने की एक ताक़ रात में पवित्र क़ुरान उतारा। सूरह अददुखा़न में फरमाया गयाः "हमने यह किताब मुबारक रात में नाजिल फरमाई" 

और सूरह अल-क़द्र में, अल्लाह तआला फरमाता हैः

"हमने इसे क़द्र की रात में उतारा और तुम नहीं जानते कि क़द्र की रात क्या है"

यह किताब सभी इंसानों के लिए एक मार्गदर्शक है, जो सही और गलत के बीच का फ़र्क साफ़-साफ़ बताती है। लेकिन सिर्फ़ वही लोग इससे फ़ायदा उठाएंगे, यानी जो मोमिन हैं, जो नमाज़ क़ायम करते हैं ,और जो उन्हें दिया गया है उसमें से ख़र्च करते हैं।

क़ुरान, जिसका सब्जेक्ट इंसान है, अल्लाह तआला फरमाताः "इसमें तुम्हारा ज़िक्र है"

(सूरह अलांबिया आयत १०)


لَقَدْ أَنْزَلْنَا إِلَيْكُمْ كِتَابًا فِيهِ ذِكْرُكُمْ

"हमने यह किताब तुम्हारी तरफ नाजि़ल की और इसमें तुम्हारा अपना ज़िक्र है"

इंसान अल्लाह के कलाम से पूरी गाइडेंस पा सकता है। ज़ाहिर है, यह एक बड़ी नेमत है जो अल्लाह ने इंसानों को दी है और मुस्लिम उम्माह के लिए इस नेमत का शुक्रगुज़ार होना ज़रूरी है। इसलिए, अल्लाह तआला ने क़ुरान के आने के महीने को रोज़े का महीना घोषित किया और उम्माह पर रोज़े रखना फ़र्ज़ किया।

"रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरान नाज़िल हुआ, तो तुममें से जिसे भी यह महीना मिले, वह रमज़ान के रोज़े रखे"।

ताकि मोमिन अपनी रूह को साफ़ करते हुए अपनी छिपी हुई इंसानी और रूहानी का़बिलियत को सामने ला सके। जिससे वह सही मायनों में अपने सच्चे रब का नेक और परहेज़गार बंदा बन सकता है।

कहा गया कि "रोज़े तुम पर इसलिए नाज़िल हुए हैं ताकि तुम तक़वा हासिल कर सको"

रोज़ा सिर्फ़ खाना-पीना छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि एक तय समय के लिए इन सभी फि़तरी  ज़रूरतों को रोकने का नाम भी है। रोज़ा इसलिए है ताकि वे सभी बुराइयाँ जो अल्लाह को नाराज़ करती हैं और जहन्नम की ओर ले जाती हैं, रोकी जा सकें। यह बात कई हदीसे मुबारिका में है कि "झूठ बोलना, चुग़ली करना, वे सभी गुनाह के काम जो एक इंसान आम दिनों में करता है और उसे इसका एहसास भी नहीं होता। कहा गया कि इन सभी बुराइयों के साथ रोज़ा मंज़ूर नहीं है।

रोज़ा इंसान के अंदर सब्र और डिसिप्लिन पैदा करता है जो इंसान को उन सभी बुराइयों से दूर रहने की ताकत देता है जो इंसानी फि़तरत के खिलाफ़ और नुक़सानदायक हैं। जिस की वजह से इंसान अपना ही दुश्मन और अल्लाह से बगावत करने वाला बन जाता है इसीलिए कुरान कहता है कि रोज़ा रखने से तुमहारे अंदर तक़वा पैदा हो।

रमज़ान के इस पूरे महीने में हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि हम रोज़ा रखते हुए खुद को सभी बुराइयों से दूर रखें और अच्छे कामों, रहम दिली, और अल्लाह की राह में ख़र्च करके अपनी दुनियावी और रूहानी ज़िंदगी को पाक करके ज़्यादा से ज़्यादा नेकी हासिल करने की कोशिश करें। यही इस महीने का असली मक़सद है।

कुरान में अल्लाह तआला फरमाता हैः    ‌

"मेरे बंदे तुमसे मेरे बारे में पूछते हैं। उन्हें बताओ कि मैं उनके बहुत क़रीब हूँ और जब कोई बंदा मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी पुकार सुनता हूँ”

उसे सिर्फ़ मेरी पुकार सुननी चाहिए ताकि वह ईमान लाए और शायद हिदायत पा ले”

दुनिया में ऐसा कौन है कि जब उस पर कोई मुसीबत आती है तो वह अपने दिल को खा़लिस करके  हक़ीक़ी रब को नहीं पुकारता। जिसने उसे पैदा किया है और जो सही मायने में उसकी मदद कर सकता है। और अल्लाह तआ़ला उसकी मदद करते हुए उसकी पुकार सुनता है।

फिर अल्लाह तआला कहता है: "मैं भी अपने बंदों को सुबह और शाम पुकारता हूँ उस रास्ते की ओर जो जन्नत की ओर ले जाता है। लेकिन बहुत कम लोग हैं जो अपने रब की पुकार सुनते हैं। और ईमान लाते हैं"।

कहा गया: "उन्हें ईमान के साथ पुकार सुननी चाहिए। तो मेरी पुकार सुने और ईमान लाएं, ताकि उन्हें हिदायत मिल जाए"।

ऐसा नहीं है कि यह कोई गै़र फितरी पुकार है, बल्कि यह इंसानी फितरत की ज़रूरत है कि वह सवाल करें और इस सवाल का जवाब चाहे। इंसानी फितरत का तका़ज़ा यह नहीं है कि वह कभी यह न सोचे कि उसके दुनिया में आने का मक़सद क्या है और उसे कहाँ जाना है। और इसके लिए, उसे किस से मदद मांगनी चाहिए।

यक़ीनन ये सलीम फि़तरत इंसान के दिल की आवाज़ है और उसके मस्तिष्क में उठने वाले सवाल हैं। जो मार्गदर्शन की ओर, और अपने मालिके हक़ीकी की पहचान की ओर ले जाते हैं।

ऐसे लोग कुरान की नज़र में उलुल अल्बाब है।

हालांकि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो पुकार सुनते हैं और उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं, क़ुरान ऐसे लोगों के बारे में कहता है कि...

यकीनन ख़ुदा के नज़दीक बद्तरीन कि़स्म के जानवर वह लोग हैं जो अकल से काम नहीं लेते”

अल्लाह ने यह महीना उन लोगों के लिए एक नेमत के तौर पर दिया है जो अल्लाह पर ईमान लाते हैं और उसकी मर्ज़ी के हिसाब से जीने की कोशिश करते हैं और वह अपने ईमान वाले बंदों को अपनी ख़ास रहमत से ट्रेनिंग देता है ताकि उनके लिए सही रास्ते पर चलना आसान और मुमकिन हो।

रमज़ान के बाद एक दिन ऐसा भी आता है जब मुसलमान अल्लाह की बड़ाई का इज़हार करते है और रमज़ान के महीने में रोज़े रखने, अपनी मर्ज़ी से नमाज़ पढ़ने और आख़िरी रातों में इबादत करने की ताक़त देने के लिए उसकी बड़ाई और शुक्रगुजा़री का ऐलान  करते है।

इस बात का शुक्रिया कि अल्लाह ने उसे जहन्नम से बचने और जन्नत की ओर ले जाने वाले काम करने का मौक़ा दिया है। इस नेमत के लिए कि उसने रमज़ान के महीने में रोज़े रखते हुए ख़ुद को तक़वा पर का़यम रहते हुए अपने रब को राज़ी करने की कोशिश की, वह इस पर ख़ुश होता है और अपने रब की बड़ाई का ऐलान करता है। इसलिए कि अल्लाह ने उसे सीधा रास्ता दिखाया, और यह चीज हर मुसलमान के अंदर शुक्र का जज़्बा पैदा करती है” 

.. ईद वह दिन है जो बार-बार आता है, यानी ईद वह दिन है जिसे हम ईदुलफित्र कहते हैं

ईद असल में ख़ुशी का दिन है इस मायने में कि हमने इस किताब पर अमल करने की कोशिश की है, जो सच्चा रास्ता दिखाने वाली रोशनी है। खुशी यह है कि हमने अपनी रूह को साफ करने की कोशिश की है। अपने रब का तक़वा हासिल करते हुए, हमने उसे खुश करने और राज़ी करने की कोशिश की है। हमने बुराई से दूर रहने और अपने अंदर छिपी कु़दरती ताकतों को बाहर लाने और इन ताकतों को अमल में लाने की कोशिश की है।

ईद का दिन खुद को सभी पाबंदियों से आज़ाद करके फिर से अपने पुराने तरीकों पर चलने और इस पर खुश होने के लिये नहीं है, बल्कि हमारी कोशिश पूरे साल अपने रब को खुश करने और उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़ जीने की होनी चाहिए, जिसका हमने रमज़ान के पवित्र महीने में पालन किया है। कुरान कहता हैः

"तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूंगा,और मेरा शुक्र अदा करो और कुफ्र मत करो"।

एक और जगह, कुरान कहता हैः

जो कोई अपने रब से मिलने की उम्मीद रखता है, उसे नेक काम करने चाहिए”

यह महीना हर साल इन नेक कामों को करने के लिए आता है और यह हमारे रब की बड़ाई (महानता)और शुक्रगुज़ारी पर पूरा होता है। 

अल्लाह तआला हम सभी मुसलमानो को अपने रब की रज़ा पर क़ायम रहते हुए नेक आ़माल‌ करने   की ताक़त और तौफ़ीक़ दे आमीन।


सबीहा सिद्दीकी

भोपाल, मध्य प्रदेश

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