पड़ोसी देशों के एक दूसरे पर अधिकार एवं दायित्व
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वैश्विक परिदृश्य
पड़ोसी देशों के एक दूसरे पर अधिकार एवं दायित्व

ईश्वर ने इस सारी सृष्टि को और उसमें हमारी धरती को इंसानों के लिए बनाया। एक मानव जोड़े से सारी मानव जाति को पैदा करके पूरी धरती पर फैला दिया। धरती और समुद्रों में इंसानी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सारी चीजें पैदा कर दी। सारी मानव जाति वास्तव में एक ही परिवार है लेकिन आपसी पहचान और अच्छी व्यवस्था के लिए, खानदान, कबीले, जातियां और देश भी बन गए। मानव समाज विकसित होते हुए आज इक्कीसवीं सदी में पहुंच गया है।

आज विश्व की जन संख्या 8.2 अरब से ज्यादा हो गई है। इस समय दुनिया में देशों की कुल संख्या 195 है। विज्ञान और तकनीकी विकास की तेज रफ्तार के कारण आज पूरी दुनिया एक विश्व गांव (ग्लोबल विलेज) बन चुकी है। 

यह भी एक सच्चाई है कि भौगोलिक सीमाओं से अलग अलग देश, संप्रभु इकाइयां बन जाने के बावजूद उनकी एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद विशेष रूप से दूसरे विश्व युद्ध के बाद  देश आज़ाद होते गए, कुछ देश विभाजित होकर नए देश भी बने और एक दूसरे के पड़ोसी भी। आज़ादी और विभाजन के कारण बने देश और पड़ोसियों के बीच विवाद भी पैदा हुए उनमें से बहुत से विवाद आज तक हल नहीं हो सके हैं। 

इस सच्चाई को हमको सामने रखना होगा कि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते। बड़े से बड़े मसले और विवाद बातचीत के माध्यम से हल किए जा सकते हैं। कई पड़ोसी देश आपस में युद्ध भी लड़ चुके हैं, लेकिन क्या युद्ध किसी मसले को स्थाई रूप से हल कर पाया है? नहीं, बल्कि युद्ध के बाद भी आपस में टेबल पर बैठ कर ही बात करनी पड़ती है। जब हम सीधे आपस में बात करने में असफल हो जाते हैं तो बाहरी प्रभावशील देशों के माध्यम से बातचीत करनी पड़ती है, पड़ोसी देशों में ऐसी स्थिति पैदा न हो इसका प्रयास दोनों देशों को करना चाहिए।

बड़ी शक्तियां भी इस तरह की स्थिति का फायदा उठाती हैं। कुछ देश जो हथियारों का व्यापार करते हैं वे चाहते हैं कि उनका व्यापार बढ़ता रहे और इसके लिए पड़ोसी देशों के खराब संबंध, तनाव और टकराव उनको फायदा पहुंचाते हैं। पड़ोसी देशों को चाहिए वे आपस में शांति के साथ रहें और हथियार का कारोबार करने वाली शक्तियों की योजनाएं से सावधान रहे।

एक दूसरे से शांति पूर्ण और मित्रतापूर्ण संबंध बनाने से दोनों देशों का रक्षा बजट भी काफी कम हो जाएगा और विकास के लिए ज्यादा बजट खर्च किया जा सकेगा।

पड़ोसी देशों के बीच अच्छे रिश्तों के लिए आवश्यक है कि एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करें। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के जो आपसी समझौते हैं उनका पालन करें। सभी पड़ोसी देश दूसरों के आंतरिक मामलों में दखल न दें। पड़ोसी देशों को घरेलू राजनीति को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास न करें। 

पड़ोसी देशों से गुजरने वाली नदियों का पानी एक प्राकृतिक स्रोत है, जिस पर सब का अधिकार है, नदियों पर बांध बनाने या अन्य प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले आपस में स्पष्ट एवं न्याय पूर्ण समझौते कर लिए जाएं और फिर उनका पूरी ईमानदारी के साथ पालन किया जाना चाहिए। किसी का पानी रोक लेना या ज्यादा पानी छोड़ना जिससे पड़ोसी देश को परेशानी हो अन्याय पूर्ण होगा और आपसी संबंधों में कड़वाहट पैदा करेगा।

सीमाओं के माध्यम से स्मगलिंग को रोकने में पड़ोसी देशों को एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। ग़ैर कानूनी तरीके से सीमा पार करने वालों को रोकने में पड़ोसी देश एक दूसरे का सहयोग करें। अपराधी तत्व, माफिया, अलगाववादी और आतंकी गतिविधियां करने वालों को रोकने में पड़ोसी देश एक दूसरे का सहयोग करें।

पड़ोसी देशों के बीच परस्पर विश्वास की मजबूती के लिए ज़रूरी है कि आपस में पारदर्शिता और स्पष्टता हो, एक दूसरे पर संदेह न हो, सामरिक गतिविधियों के बारे में एक दूसरे को विश्वास में लिया जाना चाहिए।

ज़मीन के नीचेसमुद्र में और पहाड़ों व जंगलों में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में एक दूसरे के अधिकारों का आदर करते हुए न्याय पूर्ण तरीके पर आपसी सहमति और समझौतों का पालन करना चाहिए।

विकास के प्रोजेक्ट बनाते समय इस बात का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए कि पड़ोसी देशों के लिए पर्यावरण की समस्याएं पैदा न हों। पड़ोसी देशों को इस बात का भी विशेष खयाल रखना आवश्यक है कि उनके देश में मौजूद धार्मिक, भाषाई, व नस्लीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे ताकि पड़ोसी देशों की जनता में कोई नाराजगी पैदा न हो।

पड़ोसी देशों को चाहिए कि एक दूसरे के आर्थिक विकास में मददगार बनें। विकास के साझा प्रोजेक्ट पर काम करे, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में विशेष रूप से, सड़कें, रेलवे, और बिजली उत्पादन में एक दूसरे के साथ सहयोग करें। पड़ोसी देश आपस में व्यापार को बढ़ावा दें, एक दूसरे के उद्योगों को विकसित करने में मददगार बनें।

पड़ोसी देशों को चाहिए कि आम नागरिकों के आने जाने और संपर्क को बढ़ावा दें, वीजा के नियमों को आसान करें। भारत के निकटतम पड़ोसी देश, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, बर्मा  और श्रीलंका हैं। भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो एक दूसरे के रिश्तेदार भी रहते हैं, लोगों  और परिवारों की पुरानी यादें आपस में जुड़ी हुई हैं, इन सब का लिहाज़ करते हुए, लोगों का आना जाना आसान बनाया जाना चाहिए। 

पड़ोसी देशों में विभिन्न धर्म और आस्थाओं के केंद्र मौजूद हैं, इन की वजह से भी लोग आना जाना चाहते हैं। पड़ोसी देशों को चाहिए कि आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा दें।

आज इलाज के लिए भी लोग पड़ोसी देशों में जाते हैं, इसमें एक दूसरे का सहयोग करना भी पड़ोसी देशों का एक दूसरे पर हक है। पड़ोसी देशों में जो बड़े और ज्यादा साधन सम्पन्न देश हैं उनको चाहिए कि वे छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर देशों के विकास में सहयोग करें, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में उनका सहयोग करें उनके बुनियादी ढांचे और उद्योगों को मजबूत करने में योगदान करें। बड़े और ताकतवर पड़ोसी देशों को चाहिए कि वे अपने छोटे पड़ोसियों के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें। पड़ोसी देशों के विश्व विद्यालय और रिसर्च संस्थान आपस में सहयोग भी करे और साझा रिसर्च के कार्यक्रम चलाएं।

सांस्कृतिक आदान प्रदान को प्रोत्साहित किया जाए, पड़ोसी देशों की कला, संस्कृति और साहित्य से संबंधित प्रतिनिधि मंडल एक दूसरे के यहां जाएं। मानव एवं नागरिक अधिकार, महिला अधिकार एवं सशक्तिकरण, विकास और सामाजिक जागृति के लिए काम करने वाले ग़ैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि मंडल आने जाने से नागरिकों के बीच संपर्क और सहयोग बढ़ेगा जिसका विकास पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

विभिन्न धर्मों के धर्म गुरुओं के संयुक्त प्रतिनिधि मंडलों का आदान प्रदान होगा, आपसी संवाद होगा और कुछ साझा कार्यक्रम होंगे तो बहुत सी ग़लत फहमियां भी कम होगी और आपसी विश्वास मजबूत होगा और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना में मदद मिलेगी।

प्राकृतिक आपदाओं, भूकंप, बाढ़ , अकाल और महामारी के समय पड़ोसी देशों को एक दूसरे की  हर सतह पर मदद और आपदा प्रबंधन में सहयोग करना चाहिए।

पड़ोसी देशों को एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बनने के बजाए सहयोगी बनाना चाहिए। आपसी मतभेदों और समस्याओं के बावजूद पड़ोसी देशों की सरकारों के बीच संपर्क और संवाद का  कोई चैनल अवश्य खुला रहना चाहिए, और बातचीत होते रहना बहुत आवश्यक है।


प्रोफेसर सलीम इंजीनियर 

चेयरपर्सन अवेयर ट्रस्ट, अवेयर ट्रस्ट, नई दिल्ली

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