पड़ोसियों के अधिकार: इस्लामी सभ्यता की एक अनूठी विशेषता
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पड़ोसियों के अधिकार: इस्लामी सभ्यता की एक अनूठी विशेषता

पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करना, इस्लाम के उन बुनियादी अहकाम में शामिल है जिनका ज़िक्र क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने ख़ास तौर पर किया है:

“और तुम सब अल्लाह की बन्दगी करो, उसके साथ किसी को साझी न बनाओ, माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। रिश्तेदारों और यतीमों और मुहताजों के साथ सद्व्यवहार करो और पड़ोसी रिश्तेदार से, अजनबी पड़ोसी से, पहलू के साथी और मुसाफ़िर से और उन ग़ुलामों से जो तुम्हारे अधीन हों, अच्छे व्यवहार का मामला रखो, विश्वास करो कि अल्लाह किसी ऐसे आदमी को पसन्द नहीं करता जो अपने अहंकार में चूर हो और अपनी बड़ाई पर घमंड करे।”  (क़ुरआन, सूरा-4 अन-निसा, आयत—36)

इस आयत में तीन तरह के पड़ोसियों का ज़िक्र है:

  1. रिश्तेदार पड़ोसी,

  2. अजनबी पड़ोसी,

  3. अस्थायी पड़ोसी (transient neighbour) – जैसे सफ़र में, काम की जगह पर, सड़क पर साथ चलने वाला या साथ काम करने वाला।

इन सब के बारे में अच्छे बर्ताव का हुक्म दिया गया है।

आधुनिक पश्चिमी दर्शन का केन्द्र बिन्दु "व्यक्ति" और उसके अधिकार हैं। इन दर्शनों की मुख्य विशेषता एक व्यापक प्रकार की व्यक्तिवादिता (individualism) है। इस सोच के परिणामस्वरूप जो स्वाभाविक रवैये पैदा हुए, उनमें व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता और उसके अधिकारों पर अत्यधिक ज़ोर दिया जाने लगा। अब लोगों के बीच रिश्तों को केवल निजी लाभ, और उसे नियंत्रित करने वाले क़ानूनों और समझौतों के नज़रिए से देखा जाने लगा। कानून हों या नैतिक विचार — दोनों में पूरा ज़ोर इस बात पर है कि व्यक्ति को किसी भी तरह की दखलअंदाज़ी (intrusion) या परेशानी से बचाया जाए।

पड़ोसी के संबंध में जो नैतिक अवधारणाएँ बची हैं, उनका सार बस इतना रह गया है कि हर व्यक्ति की अपनी निजी जगह (space) और अपनी संपत्ति (property) है, जिसमें किसी और को कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, और न ही किसी के व्यवहार से दूसरे को कोई तकलीफ़ पहुँचनी चाहिए। अर्थात, दूसरों के साथ संबंध सिर्फ़ इस नैतिक सिद्धांत तक सीमित हो गया है कि — “आपके किसी काम से किसी को नुक़सान न पहुँचे।” अगर आप किसी को नुक़सान पहुँचाए बिना अपनी दुनिया में मस्त रहें, तो उसे नैतिक या कानूनी दृष्टि से ग़लत नहीं माना जाता।

इस सदी की तकनीकी क्रांति ने इस स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। हर तकनीक अपनी सांस्कृतिक और सभ्यतागत ज़मीन की उपज होती है। हमारे दौर की तकनीक पर भी पश्चिमी विचारधारा और सभ्यता की गहरी छाप है। इसलिए, इस तकनीक ने व्यक्तिवाद, दूसरों से बे-रुख़ी, उदासीनता और सर्दमहरी को अपनी चरम सीमा तक पहुँचा दिया है। स्क्रीन के ज़रिए पैदा हुई तन्हाई (screen-mediated solitude) ने दुनिया के लगभग सभी शहरी समाजों में यह स्थिति पैदा कर दी है कि लोग सालों तक एक-दूसरे के बिलकुल पास रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे से पूरी तरह अनजान और बेख़बर रहते हैं।

इस पृष्ठभूमि में, पड़ोसी से संबंधित इस्लाम की शिक्षाओं की आज पूरी दुनिया को बहुत ज़रूरत है। इस्लाम ने जिस तरह परिवार के सदस्यों को एक निश्चित क़ानूनी और नैतिक अधिकार दिया है, उसी तरह पड़ोसी को भी एक तरह की क़ानूनी और धार्मिक हैसियत दी है। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)  ने फ़रमाया: “क़ियामत के दिन अल्लाह के सामने जो पहला मुक़दमा पेश होगा, वह पड़ोसियों के बीच का होगा।” (अर्थात — क़ियामत के दिन सबसे पहले पड़ोसियों के झगड़े का फैसला होगा।)

आप (सल्ल.) ने यह भी फ़रमाया: “जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने मुझे पड़ोसी के साथ भलाई करने की इतनी बार ताकीद की कि मुझे लगा कहीं उसे विरासत में हिस्सा न दे दिया जाए।”

इसका कारण यह है कि इस्लाम का सामाजिक मॉडल केवल सुरक्षित व्यक्तियों (protected individuals) या सुरक्षित परिवारों (protected households) पर केंद्रित नहीं है। यह तो उसका एक हिस्सा है, लेकिन इस्लामी समाज का असली गुण है — साझी ज़िम्मेदारी, सामूहिक सुरक्षा, परस्पर सहयोग, एक-दूसरे की मदद और भलाई का जज़्बा।

इस्लामी नैतिकता में यह ज़रूर कहा गया है कि —“अपने पड़ोसी को नुकसान मत पहुँचाओ।” लेकिन यह सिर्फ़ एक हिदायत नहीं है, बल्कि पहली हिदायत है। इसके साथ-साथ यह भी शामिल है कि —“पड़ोसी को फ़ायदा पहुँचाओ,” “उसे आराम दो,” “उसकी मुश्किलें दूर करो,” और “हर संभव तरीके से उसकी भलाई चाहो।”

आज जिन लोगों को सभ्य और सुसंस्कृत माना जाता है, वे पड़ोसियों के साथ बुरा व्यवहार तो नहीं करते, लेकिन उनसे पूरी तरह बे-रुख़ी और अनजानापन रखते हैं। ऐसे रवैये को आज के समाज में नैतिक कमी या दोष नहीं माना जाता। लेकिन इस्लामी सभ्यता में इसे एक नैतिक कमी (ethical flaw) समझा गया है कि इंसान अपने पड़ोसी या आस-पास रहने वाले से बिलकुल बे-तअल्लुक़ (असंबंधित) रहे और उसके हालात और ज़रूरतों से बेख़बर बना रहे। पड़ोसी का पहला हक़ यही है कि उससे पहचान बनाई जाए, उसकी स्थिति और हालात को समझा जाए, और उसकी ख़बरगीरी की जाए। (यानी उसकी भलाई, ज़रूरतों और परेशानियों की जानकारी रखी जाए।) इस पहले कदम के बिना वह अच्छा बर्ताव (हुस्ने सुलूक) मुमकिन ही नहीं, जिसकी इस्लाम तालीम देता है।

नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया: “क़ियामत के दिन कितने ही पड़ोसी ऐसे होंगे जो अपने पड़ोसी से शिकायत करते हुए कहेंगे, ‘ऐ मेरे रब! इसने अपना दरवाज़ा मेरे लिए बंद रखा और मुझे अपनी भलाई और मदद से वंचित रखा।’”

एक दूसरी मशहूर हदीस में आपने बहुत सख़्त अल्फ़ाज़ में फ़रमाया: “वह व्यक्ति मोमिन नहीं, जो ख़ुद पेट भरकर खाए जबकि उसका पड़ोसी उसके पास भूखा हो।” इस हदीस से हमदर्दी (सहानुभूति) के साथ-साथ ख़बरगीरी की अहमियत भी मालूम होती है। क्योंकि अगर कोई व्यक्ति बे-तअल्लुक़ रहेगा, तो उसे यह पता ही नहीं चलेगा कि उसका पड़ोसी किस हाल में है। इसी तरह यह हदीस सिर्फ़ भूख के मामले पर ही लागू नहीं होती, बल्कि बीमारी, अकेलापन, बुढ़ापे की परेशानियाँ, या किसी पर ज़ुल्म होने जैसी स्थितियों में भी पड़ोसी के हालात जानना और ज़रूरत पड़ने पर उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना ये सब पड़ोसी के हक़ में शामिल है।

पड़ोसी के हालात से वाक़िफ रहने और बे-रुख़ी से बचने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि किसी की निजी ज़िंदगी में दख़ल दिया जाए या अनावश्यक हस्तक्षेप (intrusion) को अपना तरीक़ा बना लिया जाए। कई पूर्वी समाज (Eastern societies) इस दूसरी अति (चरमपंथ) में फँसे रहते हैं, जहाँ लोग दूसरों के मामलों में हद से ज़्यादा दख़ल देने लगते हैं। 

हर मामले की तरह इस मामले में भी इस्लाम संतुलन और एतिदाल (मध्यम मार्ग) की शिक्षा देता है। क़ुरआन मजीद में घरों में प्रवेश के बारे में स्पष्ट हिदायत दी गई है: “ऐ ईमान लाने वालो! अपने घरों के सिवा किसी और के घर में दाख़िल मत हुआ करो, जब तक कि घर वालों से इजाज़त न ले लो और उन पर सलाम न भेज दो।” (क़ुरआन, सूरह-24 अन-नूर, आयत— 27)

इस्लाम ने पड़ोसी के अधिकारों का एक विस्तृत चार्टर दिया है। हदीसों में सिर्फ़ पड़ोसी की ख़बरगीरी और उसकी मदद करने पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि, उसके राज़ों की हिफ़ाज़त की जाए, उसकी कमज़ोरियों पर पर्दा डाला जाए, उसकी इज़्ज़त और आबरू की रक्षा की जाए, और उसके साथ भलाई और एहसान का बर्ताव किया जाए।

शिया स्रोतों (Shia sources) में इमाम ज़ैनुल आबिदीन (रहमतुल्लाह अलैह) का “रिसालतुल-हुक़ूक़” (अधिकारों का पुस्तिका) बहुत मशहूर है। इस किताब में बहुत खूबसूरत भाषा और असरदार अंदाज़ में पचास अधिकारों की दिलकश व्याख्या की गई है। उसमें पड़ोसी के हक़ से संबंधित हिस्सा, इस्लामी दृष्टिकोण से पड़ोसी के अधिकारों की पूरी अवधारणा का सार (संपूर्ण निचोड़) माना जा सकता है।

पड़ोसी का हक़ यह है कि उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसकी इज़्ज़त और शान की रक्षा करो, और उसकी मौजूदगी में उसका आदर करो — हर हाल में उसकी मदद और सहायता करो। उसके राज़ के टोह में मत रहो और न उसकी कमज़ोरियाँ तलाश करो। अगर अनजाने में तुम्हें उसका कोई दोष पता भी चल जाए, तो उसके लिए ऐसा मज़बूत क़िला और मोटी ढाल बन जाओ कि किसी तरह उसका वह राज़ बाहर न जा सके।

उसकी बेख़बरी में उसकी बातों को छिपकर मत सुनो और उसे कठिनाइयों और मुश्किलों में अकेला छोड़कर अलग मत हो जाओ। जब उसके पास कोई नेमत या भलाई दिखे तो उस पर ईर्ष्या मत करो। उसकी ग़लतियों पर पर्दा डालो और उसके गुनाहों से आँखें फेर लो। अगर वह तुम्हारे बारे में कोई नादानी भरी हरकत कर दे तो भी अपनी ओर से उसे वंचित मत करो।

पड़ोसी के लिए अच्छाई और सलामती का सबब बनो। यदि वह किसी की साज़िश का शिकार हो तो आगे बढ़कर उसके ख़लाफ़ फ़रेब और चालों को नाकाम बनाओ। उसके साथ शरीफ़ाना और करीमाना व्यवहार करो, और यह जान लो कि ताक़त और कामयाबी तो बस अल्लाह ही की तरफ़ से है।

यह खूबसूरत आचार संहिता उन पड़ोसियों पर भी लागू होती है जो हमारे घरों के नज़दीक रहते हैं और उन “असहाबुल जनब” पर भी, यानी वे लोग जो किसी भी स्तर पर हमारे साथ काम करते हैं या हमारे साथ ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं।

यह बात भी साफ़ समझ लेनी चाहिए कि पड़ोसियों के बीच किसी तरह का भेदभाव या भलाई के व्यवहार में कोई चयन (चयनात्मकता) इस्लाम को पसंद नहीं है। आम तौर पर लोग अपने आस-पास के उन व्यक्तियों से घनिष्ठ संबंध बनाना पसंद करते हैं जो हम-मिज़ाज, हम-ख़याल हों या एक ही पेशे (profession) से जुड़े हों। कई बार लोग नज़दीकी रिश्तों के लिए सामाजिक दर्जे (status) की समानता भी देखते हैं। लेकिन अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने साफ़ फ़रमाया कि ये सारे ख़ुद बनाए हुए मापदंड (self-made standards) सही नहीं हैं। इस्लाम के अनुसार तरजीह (preference) का आधार केवल घर के दरवाज़े की निकटता है। आप (सल्ल.) ने फरमाया: “तरजीह उसी को है जिसका दरवाज़ा तुम्हारे दरवाज़े के ज़्यादा क़रीब हो।”

ग़ैर-मुस्लिम पड़ोसी से भी अच्छे संबंध रखना इस्लाम की शिक्षा है। यहां बताए गए सभी अधिकार उनके लिए भी समान रूप से लागू होते हैं। इसी तरह ग़रीब पड़ोसी को भी बिल्कुल वही अधिकार हासिल हैं। शानदार इमारतों के पास बनी झुग्गी-झोंपड़ियाँ, बिल्डिंगों में वॉचमैन के कमरे, या नौकरों के क्वार्टर — इन सब को भी पड़ोसी समझना और बराबरी का व्यवहार करना ज़रूरी है।

आदर्श पड़ोस (Ideal Neighbourhood), आदर्श इस्लामी सभ्यता की पहली सीढ़ी है। अगर पड़ोस आदर्श नहीं होगा तो न आदर्श राज्य (Ideal State) बन सकता है, न आदर्श समाज (Ideal Civilization)। इसलिए ज़रूरी है कि हम हर संभव कोशिश करें कि मुस्लिम समाज “इस्लामी पड़ोस” का सच्चा प्रतिनिधि बने, जो अपने आचरण से इस्लामी संस्कृति के सुंदर रूप को दुनिया के सामने दिखाए, और लोगों को उसकी भलाई और आकर्षण की तरफ़ प्रेरित करे।

साभारः कान्ति मासिक


संदर्भ सूची (हदीस के स्रोत)

  1. मुसनद अहमद (17372) — अल्बानी ने इसे सहीह कहा। (सहीह अल-जामे, हदीस: 2563)

  2. अबू दाऊद (5152), तिर्मिज़ी (1943), मुसनद अहमद (6496) — अल्बानी ने इसे सहीह कहा। (सहीह तिर्मिज़ी, हदीस: 1943)

  3. अल-अदब अल-मुफ़रद / किताब अल-जार / हदीस: 111 — अल्बानी ने कहा: हसन लि-ग़ैरिह। (सहीहा, हदीस: 2646)

  4. सुनन अल-बैहक़ी (20160) — अल्बानी ने इसे सहीह कहा। (सिलसिला अहादीस सहीहा / अल-आदाब वल-इस्तेज़ान, हदीस: 2828)

  5. सहीह बुख़ारी / किताब अश-शुफ़अह / हदीस: 2259



सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी

राष्ट्रीय अध्यक्ष, जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द

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