इस्लामिक शासनकाल में सामाजिक ताना बाना
each-article
विविध
इस्लामिक शासनकाल में सामाजिक ताना बाना

इस्लाम एक व्यापक, मानव प्रकृति के अनुसार और संतुलित जीवन व्यवस्था है जो जीवन के सभी पहलुओं  को समाहित करता है, और स्पष्ट मार्गदर्शन भी देता है, चाहे वो व्यक्तिगत हो और सामूहिक। ईमान, यकीन , नैतिकता और इबादत के साथ-साथ सामूहिक जीवन सभी क्षेत्रों में नियम और कानून प्रदान करता है। सामूहिक जीवन के श्रेष्ठ  व्यवस्थापन एवं नियंत्रण हेतु एक शासन व्यवस्था  की स्थापना की जाती है। शासन व्यवस्था  के माध्यम से ही समाज का विकास, शांति और न्याय संभव है। इसके अभाव से  मनुष्यों में अव्यवस्था, उत्पीड़न और अराजकता उत्पन्न होती है। राजकीय व्यवस्था का मूलभूत प्रयास  प्रत्येक नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों की सुरक्षा और और कानून का पालन होता है । सामूहिक जीवन में शासन  व्यवस्था समाज के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी आत्मा शरीर के लिए। 

 चूंकि इस्लाम एक सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था है इसलिए शासन प्रणाली में भी शांति और न्याय की स्थापना के लिए स्पष्ट शिक्षा प्रदान की है। मानव निर्मित व्यवस्था न व्यापक हो सकती है न सम्पूर्ण। जबकि इस्लामी व्यवस्था उस सर्वशक्तिमान अल्लाह की दी हुई है जो मनुष्य के भूत और भविष्य से समान रूप से परिचित है। मानवीय व्यवस्थाओं में नियम और कानून व्यक्ति या  विशेष वर्ग की इच्छानुसार परिवर्तित हो सकते है या उनमें संशोधन हो सकते है। जबकि ईश्वर दत्त व्यवस्था अटल, त्रुटि रहित और सर्वकालिन होती है। 

इस्लामी शासन व्यवस्था में अल्लाह सर्वशक्तिमान की सर्वोच्च संप्रभुता को स्वीकार किया गया है।इस  व्यवस्था  के आधारभूत स्रोत कुरआन और सुन्नत पर आधारित नियम- कानून है। इस्लामी शासन व्यवस्था के दृष्टिकोण के अनुसार शासक जनता के सेवक होते है। इस्लामी इतिहास का प्राथमिक युग इस व्यवस्था का आदर्श नमूना है जहां उत्पीड़न और अत्याचार के बजाय, न्याय और निष्पक्षता कायम थी। सभी नागरिकों को धर्म- सम्प्रदाय के भेदभाव के बगैर  समान अधिकार और प्रगति के समान अवसर प्राप्त थे। यदि हम इतिहास का अध्ययन करें तो ज्ञात होता हैं कि  इस्लामी युग में मनुष्यों के बीच एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित थी, जो एकेश्वरवाद, न्याय, समानता, भाईचारे और मानव के सम्मान पर आधारित थी। अल्लाह और बंदों के सामने उत्तरदायित्व की भावना ने इन मूल्यों को विश्वसनीय ही नहीं बनाया बल्के उनमें जान पैदा कर दी थी। नियम कानून अगर आस्था से जुड़ जाए तो उसको लागू करने में व्यक्ति स्वशिस्त का अनुपालन करता है। जिसकी वजह से पारस्परिक संबंधों में मिठास पैदा होती है, और सामाजिक व्यवस्था 

भी सुदृढ़ बनती है। 

इस्लामी शासन काल की विशेषता यह थी कि यहाँ मनुष्य मनुष्य के दरम्यान कोई भेदभाव नहीं था। अमीर और गरीब, काले और गोरे, शासक और शासित, तथा अरब और गैर-अरब के बीच समानता और समता  पाई जाती थी जिसकी आधारशिला इस्लाम की निम्नलिखित शिक्षाएं थी । जैसे कुरआन में कहा गया,

یا ایھا الناسُ انا خلقناکم من ذکر وانثی وجعلناکم شعوبا و قبائل لتعارفوا(سورہ الحجرات :13)

ऐ इंसानों, हमने तुम्हें एक नर और एक नारी से पैदा किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और कबीलों में विभाजित किया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको।

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया:

सारी मानवजाति आदम की संतान है, और आदम मिट्टी से बनाया गया था। (तिर्मिज़ी)

इसी तरह न्याय भी सभी लोगों के लिए निष्पक्ष था। उदाहरणार्थ

हज़रत उमर इब्नुल-खत्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) की ख़िलाफ़त के दौरान, एक किब्ती  युवक ने एक अमीर के बेटे से न्याय प्राप्त किया। इससे पता चलता है कि इस्लामी राज्य में न्याय प्रत्येक नागरिक का अधिकार था।

हज़रत उमर इब्नुल -खत्ताब (रज़ि.) की ख़िलाफ़त के दौरान, हज़रत अम्र इब्नुल-आस (रज़ि.) मिस्र के गवर्नर थे। एक किब्ती गुलाम ने  गवर्नर के बेटे, मुहम्मद इब्ने अम्र को घुड़दौड़ में हरा दिया। गवर्नर के बेटे ने क्रोधित होकर किब्ती  को कोड़े मारते हुए कहा, "मैं रईसों का बेटा हूँ।"

किब्ती  न्याय के लिए हज़रत उमर (रज़ि.) से शिकायत करने मदीना गया। हज़रत उमर (रज़ि.) ने तुरंत गवर्नर और उसके बेटे को बुलाया। और किब्ती  से कहा: "यह कोड़ा लो और इसे वैसे ही मारो जैसे इसने तुम्हें मारा है।"

किब्ती ने बदला लिया। तब हज़रत उमर ने कहा: "ऐ अम्र! तुमने कब से लोगों को गुलाम बना रखा है, जबकि उनकी माताओं ने उन्हें आज़ाद जन्म दिया था?"

सामाजिक ताने बाने को मजबूत करने में सिर्फ सगे संबंधियों के साथ ही भलाई करने की शिक्षा इस्लाम ने नहीं दी बल्कि पड़ोस के साथ भी श्रेष्ठ व्यवहार करने का आदेश दिया। सच्ची बात यह है के दो पड़ोस एक दीवार से नहीं दिल से जुड़े होते है। यह संबंध जितना खिलेगा समाज उतना ही दृढ़ बनेगा। पड़ोस के साथ इस संबंध को सिर्फ सिफारिश से नहीं जोड़ा गया बल्कि उन्हें इसका आदेश दिया गया।

इस्लामी शासनकाल के दौरान, पड़ोसियों और समाज के सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार, सहयोग और सहानुभूति को मौलिक और नैतिक सिद्धांत माना जाता था। पवित्र कुरान में कहा गया है:

وَاعۡبُدُوا اللّٰهَ وَلَا تُشۡرِكُوۡا بِهٖ شَيۡـئًـا‌ ؕ وَّبِالۡوَالِدَيۡنِ اِحۡسَانًا وَّبِذِى الۡقُرۡبٰى وَالۡيَتٰمٰى وَ الۡمَسٰكِيۡنِ وَالۡجَـارِ ذِى الۡقُرۡبٰى وَالۡجَـارِ الۡجُـنُبِ وَالصَّاحِبِ بِالۡجَـنۡۢبِ  سورۃ النساء:36

और अल्लाह की इबादत करो और किसी को उसका साझी न ठहराओ, और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो, और रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ अच्छा व्यवहार करो, और अपने पड़ोसी, अपने अजनबी पड़ोसी और अपने पहलू के साथी के साथ अच्छा व्यवहार करो । 

आयशा (अल्लाह उन पर प्रसन्न हो) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया:

ما زال جبرءیل یوصینی بالجار حتیٰ ظننت انہ سیورصہ  ۔ ( صحیح بخاری ومسلم)

 "जिब्रील बार बार मुझे पड़ोसियो के बारे में ताकीद करते रहे यहां तक की मुझे यह महसूस हुआ कि  कहीं पड़ोसी को विरासत में शामिल न कर दिया जाये। " (सहीह बुखारी और मुस्लिम)

हज़रत अली (रज़ी.) ने कहा: "जो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता, वह हम में से नहीं है।" जिस तरह एक व्यक्ति का अपने करीबी रिश्तेदारों के साथ संबंध होता है, उसी तरह उसका अपने पड़ोस में रहने वालों के साथ भी संबंध होता है और अधिकतर उनके साथ बातचीत होती है। वास्तव में, अच्छे और बुरे पड़ोसी सामाजिक जीवन व्यवस्था को मजबूत बनाने में में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर पड़ोसी अच्छा, शिष्टवान और चरित्रवान हो तो जीवन सुखमय होता है, और अगर पड़ोसी अच्छा न हो, तो घर में सुख-सुविधाओं के सभी साधन होने के बावजूद, व्यक्ति मात्र सच्ची शांति से वंचित नहीं रहता बल्कि उसका जीवन  नर्क रूप बन जाता है। इसीलिए, जहाँ शरियत ने माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के अधिकारों को परिभाषित किया है, वहीं पड़ोसियों के अधिकार, उनकी स्थिति और उनके साथ रहने के तरीके का भी विवरण दिया है।

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पड़ोसियों के सम्मान और उनके साथ अच्छे व्यवहार पर ज़ोर दिया, यहाँ तक कि इसे ईमान का भाग और जन्नत में प्रवेश की शर्त, और अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व) के प्रेम का एक मापदंड घोषित किया।

इसलिए, हम देखते हैं कि इस्लामी युग में लोग अपने पड़ोसियों के साथ वैसा ही प्रेम और सम्मान से पेश आते थे जैसा वे अपने परिवार के साथ करते थे। वे अपने पड़ोसियों के सुख-दुख में बराबर की भागीदारी करते थे। अगर वे बीमार पड़ते, तो उनसे मिलने जाते और उनका हालचाल पूछते। अगर उनकी मृत्यु हो जाती, तो वे उनके अंतिम संस्कार में शामिल होते और दफ़न में मदद करते। अगर वे उधार मांगते, तो वे उन्हें दे देते। अगर वे कोई गलती करते, तो उसे छिपा लेते। अगर कोई खुशी का अवसर होता तो वे दिल की गहराइयों से उन्हें बधाई देते। अगर उन पर कोई विपत्ति आती, तो वे अपनी संवेदना व्यक्त करते और अपनी पूरी क्षमता से उन्हें उससे निकलने में मदद करते। उस समय, उन्हें इस बात की भी चिंता रहती थी कि उनका भवन  पड़ौसी के घर से इतना ऊँचा न हो कि उनके घर में हवा बंद हो जाए। कोई विशेष पकवान  घर में बनता तो अपने पड़ौसी के घर ज़रूर भिजवाते। हर पड़ोसी इस बात की चिंता करता कि उसका कोई पड़ोसी भूखा तो नहीं है, क्योंकि वह जानता था कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: "वह व्यक्ति ईमानवाला नहीं है जो रात को पेट भरकर सोता है और उसे इसकी चिंता नहीं होती, कि उसका  कोई पड़ोसी भूखा है और उसे पता है कि उसे भूख लगी है,

आप (स.अ.व) ने यह भी कहा कि जब तुममें से किसी के घर  सालन पकाया जाए , तो उसमें थोड़ा शोरबा बढ़ा लेना  चाहिए और फिर उसमें से कुछ अपने पड़ोसी को भेजना चाहिए। इस्लामी युग में, एक पड़ोसी का दूसरे पड़ोसी के प्रति व्यवहार इतना नेक था कि वह उनके प्रति पूरी तरह संतुष्ट और निर्भय ही नहीं रहता था, बल्कि ज़्यादा सुरक्षित महसूस करता था। कि मेरा पड़ोसी मेरे साथ है। यहाँ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अगर पड़ोसी बिन-मुस्लिम भी होता, तो वे उसके साथ भी अच्छा व्यवहार करते थे। वे अपने बिन-मुस्लिम पड़ोसी के अधिकारों को अच्छी तरह जानते और उस पर अमल करते थे। वे उनके  प्रति भी वैसा ही प्रेम, सहानुभूति, ईमानदारी और सम्मान दिखाते थे जैसा मुस्लिम पड़ोसी के साथ होता था। क्योंकि इस्लाम ने इसमें किसी प्रकार के भेदभाव को

सही नहीं ठहराया। इसीलिए वे अपने बिन-मुस्लिम पड़ोसियों को  कुरआन और हदीस में वर्णित पड़ोसियों के सभी अधिकारों में शामिल करते थे। 

इस्लामी इतिहास में, मुहाजिरीन और अंसार के बीच का रिश्ता भाईचारे, त्याग और निस्वार्थता का सबसे अच्छा उदाहरण है। जब पैगम्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का से मदीना की ओर हिजरत की तो मक्का के मुसलमानों यानी मुहाजिरीन ने अल्लाह के मार्ग  में अपना सब कुछ त्याग दिया था। वे बिल्कुल खाली हाथ मदीना पहुंचे थे लेकिन मदीना के मुसलमान, जिन्हें अंसार कहा जाता है, ने मुहाजिरीन का बड़े उत्साह से स्वागत किया और उनके लिए अपने घर, संपत्ति, जमीन और दिल के दरवाजे खोल दिए।

मदीना में, पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) ने विभिन्न समुदायों और धर्मों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता किया, जिसे ‘मीसाक़े मदीना’ (मदीना का समझौता) कहा जाता है। इस समझौते ने मुसलमानों, यहूदियों और अन्य कबीलों को एक समान सामाजिक और नागरिक व्यवस्था में एकजुट किया और प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार प्रदान किए। इस्लामी शासनकेकाल में मुसलमान अपने साथियों के साथ भी नैतिक पूर्ण व्यवहार करता था। वो शांति के क्षण हो या युद्ध का अवसर। बद्र, उहद और ख़ंदक़  की लड़ाइयों के दौरान, उन्होंने एक-दूसरे का जिस तरह साथ दिया वो अपनी मिसाल आप है। कुछ अपने घायल साथियों को पानी पिलाते थे, कुछ मरहम पट्टी करते, कुछ उनके लिए दुआ करते थे, और कुछ अपना भोजन दूसरों के साथ बाँटते थे। अल्लाह तआला पवित्र क़ुरआन में फ़रमाता है:

"وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى"

"एक दूसरे की नेकी और परहेज़गारी में मदद करो।" (सूरा अल-माइदा: 2)

कोई भी समाज स्त्रियों के बगैर सम्पूर्ण नहीं हो सकता इस्लामी सामाजिक व्यवस्था में उनकी भूमिका भी बहुत महत्व पूर्ण है। इस्लाम ने सिर्फ उन्हें मूलभूत मानवीय अधिकार ही नहीं दिए बलके उनकी प्रकृति अनुसार सामाजिक भूमिका भी तय की। यही वजह थी कि इस्लामी शासनकाल में सामाजिक व्यवस्था इस प्रकार बनी कि स्त्रियोंने जीवन के सभी क्षेत्रों में अपना योगदान दिया। कुरआन में अल्लाह फरमाता है

"ईमानवाले मर्द और ईमानवाली औरतें, ये सब एक-दूसरे के साथी हैं, भलाई का हुक्म देते और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करते हैं।"(सुर: तौबा 71)

इस्लाम ने मानव गरिमा को बहुत ऊंचा स्थान प्रदान किया है। किसी भी व्यक्ति के स्वमान को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। इस्लामी शासनकाल में इसका भी ध्यान रखा जाता था कि किसी का अपमान न हो। 

एक आदर्श समाज की रचना सिर्फ धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं से नहीं होती, उसके लिए एक राजकीय व्यवस्था की आवयश्कता अनिवार्य है। व्यवस्था को मजबूत बनाने में कानून को एक दरजा अधिक प्राप्त है, और कानून व्यवस्था का  अमलीकरण शासन प्रणाली के बिना संभव नहीं। दूसरी और व्यक्तिगत अनुशासन के बिना भी कानून व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। इस्लाम ने जो व्यवस्था और शिक्षा दी है उसके अनुसार व्यक्तिगत सामाजिक और राजकीय स्तर पर एक सुंदर तालमेल नजर आता है, यही तालमेल एक स्वप्नरूप आदर्श समाज का निर्माण करता है। किसी भी विचारधारा की सफलता को परखने का सबसे महत्वपूर्ण समय उसका शासनकाल ही है। इस्लामी

शासनकाल के अध्ययन से जो सामाजिक तानाबाना दिखाई पड़ता है उसका उदाहरण इतिहास में कही ओर नहीं दिखाई देता।


आरफ़ा परवीन

प्रधान संपादक, आभा ई मैग्ज़ीन

हालिया अपलोड

https://admin.aabhamagazine.in/ArticleFeatureImage/1762349547feature_image.jpg
वैश्विक परिदृश्य
पड़ोसी देशों के एक दूसरे पर...
  • people मानव
  • clock 6 जुलाई 2019
  • share शेयर करना

ईश्वर ने इस सारी सृष्टि को और उसमें हमारी धरती को इंसानों के...

https://admin.aabhamagazine.in/ArticleFeatureImage/1762349373feature_image.jpg
समाज
पड़ोसियों के अधिकार: इस्लामी सभ्यता की...
  • people मानव
  • clock 6 जुलाई 2019
  • share शेयर करना

पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करना, इस्लाम के उन बुनियादी अहकाम में शामिल है...

https://admin.aabhamagazine.in/ArticleFeatureImage/1762348977feature_image.jpg
विविध
इस्लामिक शासनकाल में सामाजिक ताना बाना...
  • people मानव
  • clock 6 जुलाई 2019
  • share शेयर करना

इस्लाम एक व्यापक, मानव प्रकृति के अनुसार और संतुलित जीवन व्यवस्था है जो...

https://admin.aabhamagazine.in/ArticleFeatureImage/1762348715feature_image.jpg
विविध
आधुनिक शहरी जीवन में धुँधलाती पड़ोस...
  • people मानव
  • clock 6 जुलाई 2019
  • share शेयर करना

दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले की शांत गलियों में, जहाँ कभी शाम की...