आधुनिक शहरी जीवन में धुँधलाती पड़ोस की धारणा और इंसान का अकेलापन
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आधुनिक शहरी जीवन में धुँधलाती पड़ोस की धारणा और इंसान का अकेलापन

दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले की शांत गलियों में, जहाँ कभी शाम की चाय की ख़ुशबू अज़ान की पुकार और गली के बच्चों की किलकारियों में घुल जाया करती थी, वहीं रहती थीं एक बूढ़ी विधवा – गीता देवी। वे अकेली ही रहती थीं, उनकी ज़िदंगी के असली साथी उनके पड़ोसी थे। वे आपस में त्योहारों पर घर का बना अचार और मिठाई बाँटते, जब वे कभी रिश्तेदारों के पास जातीं तो पड़ोसी उनके छोटे से घर की रखवाली करते, और उनके पति की लंबी बीमारी में पड़ोस के शफीक़ भाई और श्याम जी देर रात तक बैठे रहते, यही सब मुहल्ले के पड़ोसी उनका परिवार और जीवन का सहारा थे। 

लेकिन समय धीरे-धीरे बदलता गया। खुले आँगनों वाले वे छोटे-छोटे मकान अब ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं में बदल चुके थे। जिन दरवाज़ों पर कभी ताले नहीं लगते थे, वहाँ अब मोटे दरवाज़े और बंद खिड़कियाँ थीं। नये पड़ोसी आए, पर तेज़ कदमों और थके चेहरों के साथ बातचीत का वक़्त नहीं, आत्मीयता की जगह नहीं। वह गली, जो कभी मिलनसारी की आवाज़ों से गूँजती थी, अब ट्रैफ़िक की गड़गड़ाहट और मोबाइल की रिंगटोन में खो चुकी थी।

सन 2024 की एक बरसाती शाम, गीता देवी अपने छोटे से आँगन में फिसल गईं। बादलों की गड़गड़ाहट ने उनकी पुकार को दबा दिया। कोई हाथ उन्हें थामने नहीं आया, किसी ने नहीं कहा कि “ताई मैं हूँ यहाँ”। वे पड़ोसी, जो कभी आपातकाल में लालटेन लेकर दौड़े चले आते थे, अब वहाँ नहीं थे। उनकी जगह अजनबी थे, अपनी स्क्रीन की दुनिया में खोए हुए, दरवाज़ों और दिलों को कसकर बंद किए हुए।

गीता देवी की यह कहानी केवल उनकी नहीं है। यह उन अनगिनत बुज़ुर्गों, अकेले पड़े परिवारों और टूटते समुदायों की दास्तान है जिन्हें आधुनिक शहरीकरण और तेज़-रफ़्तार जीवन ने रिश्तों से काट दिया है। यह हमें झकझोर कर पूछती है: क्या हम सचमुच तरक़्क़ी कर रहे हैं, या अपने सामाजिक और मानवीय ताने-बाने को खोते जा रहे हैं?

पड़ोस का क्षरण : मोहब्बत से बेगानगी तक

पड़ोस कभी इंसानी रिश्तों की पहली सीढ़ी हुआ करता था। घर से बाहर निकलते ही वही लोग मिलते थे जो जीवन के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे। बीमारी में दवा लाने और अस्पताल तक पहुँचाने वाला पड़ोसी ही होता था। शादी-ब्याह में चावल, बर्तन और मदद भी वही देता था।

लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। पड़ोस की अवधारणा "साझेदारी" से "सह-अस्तित्व" तक सिमट चुकी है। लोग एक ही इमारत में रहते हैं, पर एक-दूसरे से अनजान हैं। बच्चों के खेलने की जगह मॉल और स्क्रीन ने छीन ली है। मोहल्ले अब रिश्तों की बजाय महज़ पते बनकर रह गए हैं।

सामाजिक कारण : गतिशीलता और डिजिटल दूरी

समाजशास्त्रियों के अनुसार, सामाजिक गतिशीलता और डिजिटल प्रगति ने हमें नज़दीक लाने के बजाय दूर कर दिया है।

  • नौकरियों और शिक्षा के लिए परिवार एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं, जड़ें टिकती ही नहीं।

  • रिश्तों को निभाने का वक़्त नहीं, और पड़ोसी महज़ "फ्लैट नंबर" बनकर रह जाते हैं।

  • डिजिटल दुनिया ने आमने-सामने की बातचीत को खा लिया। जहाँ पहले लोग आँगन में बैठकर गपशप करते थे, अब वहीं सोशल मीडिया के खाली चैट-बॉक्स भरते हैं।

कल्पना कीजिए—गीता देवी जैसी बुज़ुर्ग महिलाएँ, जिनकी उँगलियाँ स्मार्टफ़ोन पर व्हाट्सऐप की स्क्रीन स्क्रॉल नहीं करतीं या करती भी हैं तो भी, उनके लिए तो वे असली आवाज़ें जिन्हें सुन कर उनके चेहरे पर रौनक़ आ जाया करती थी, कहीं गुम हो चुकी हैं। यह अकेलापन आंकड़ों से नहीं, दिल से महसूस किया जा सकता है।

आर्थिक कारण : जेंट्रीफिकेशन और असमानता

आर्थिक बदलावों ने भी मोहल्लों की धारणा को गहरी चोट पहुंचाई है।

  • जेंट्रीफिकेशन (अभिजातीकरण) ने पुराने बाशिंदों को उजाड़ दिया है। जिन गलियों में पीढ़ियाँ बसी थीं, वहाँ अब महंगे फ़्लैट्स और शोरूम खड़े हो गए हैं।

  • संपत्ति की क़ीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि मध्यम और ग़रीब वर्ग धीरे-धीरे शहरों से बाहर धकेल दिए गए हैं।

  • बच्चों का खेल, परिवारों की जड़ें और सामाजिक जुड़ाव—सब लाभ-हानि की गणना में खो गए हैं।

नतीजा यह है कि मोहल्ला अब "समुदाय" नहीं, बल्कि "बाज़ार" बन चुका है।

राजनीतिक कारण : योजनाएँ, असमानताएँ और विभाजन

राजनीतिक नीतियों ने भी मोहल्लों की आत्मा को प्रभावित किया है।

  • शहरी नियोजन अब इंसानों की ज़रूरत से ज़्यादा निवेशकों और बिल्डरों के हित में होता है।

  • सुविधाओं का असमान वितरण—कुछ इलाक़ों में चौड़ी सड़कें और पार्क, तो कुछ में गड्ढे और अंधेरी गलियाँ।

  • सांप्रदायिक और जातीय विभाजन की राजनीति ने विश्वास को तोड़ा है। मोहल्ले अब धार्मिक और जातीय आधार पर बाँटे जा रहे हैं।

यह स्थिति लोगों को यह महसूस कराती है कि वे अपने जीवन के "खेल" में महज़ मोहरे हैं, जिनकी आवाज़ नौकरशाही और राजनीति की गूँज में डूब जाती है।

सांप्रदायिक दरारें : एक मोहल्ला, कई दीवारें

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में सांप्रदायिक हिंसा और जातीय तनाव ने पड़ोस को विभाजित कर दिया है।

  • पहले जहाँ एक गली में ईद और दीपावली मिल-जुल कर मनाए जाते थे, अब वहाँ दीवारें और अविश्वास पनप रहे हैं। कॉलोनियों में अब धर्म देख कर मकान बेचे या किराये पर दिए जाते हैं।

  • सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के बाद परिवार "सुरक्षित" क्षेत्रों में बसने लगे हैं, जिससे शहर अलग-अलग "घेट्टो" में बदल रहे हैं।

  • बच्चों की पीढ़ी विविधतापूर्ण मित्रता की सरल ख़ुशी से वंचित होकर विरासत में पूर्वाग्रहों की गठरी पा रही है।

यह घाव किसी भी भौतिक चोट से गहरे हैं, क्योंकि ये शरीर नहीं आत्मा और विश्वास को चीरते चले जाते हैं।

पूंजीवाद और उपभोक्तावाद : आत्मीयता का सौदा

पूंजीवाद ने मोहल्लों को प्रतिस्पर्धा के मैदान में बदल दिया है।

  • अब "समुदाय" का मतलब साझा इंसानियत नहीं, बल्कि ब्रांडेड जीवनशैली है।

  • भौतिक संपत्ति सफलता का पैमाना बन चुकी है, जिससे लोग रिश्तों की बजाय तुलना और ईर्ष्या में उलझ जाते हैं।

  • मकान अब "घर" नहीं, बल्कि "निवेश" हैं। जो भी आकर रहा, कुछ ही समय बाद बेचकर चला गया।

विडंबना यह है कि उपभोग की अंधी दौड़ में हमने इंसानी रिश्तों का ही "उपभोग" कर डाला है।

अन्य कारण : पर्यावरण, अपराध और तकनीक

पड़ोस के क्षरण में और भी कारक हैं:

  • प्रदूषण और हरियाली की कमी ने भी खुले में बैठने और मेल-मिलाप की परंपरा को गहरी चोट पहुंचाई है।

  • अपराध और हिंसा के बढ़ते ग्राफ ने अविश्वास और भय को जन्म दिया है, लोग एक दूसरे से डरने लगे हैं।

  • डिजिटल आदतों ने बच्चों, युवाओं और बुज़ुर्गों सभी को आभासी दुनिया में क़ैद कर दिया है।

  • शहरी फैलाव और कमज़ोर परिवहन व्यवस्था ने भी लोगों के बीच दूरी बढ़ाने में योगदान दिया है।

पड़ोसियों के अधिकार: इस्लाम और मानवीय परंपरा की रोशनी

इतिहास गवाह है कि जब इंसान रिश्तों से कटता है तो अकेलापन और अव्यवस्था बढ़ती है। लेकिन धर्म, संस्कृति और परंपरा हमें रास्ता दिखाते हैं। इस्लाम विशेष रूप से पड़ोसियों के अधिकारों पर ज़ोर देता है। पवित्र क़ुरआन, सूरह अन-निसा (4:36) में है: "अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, और माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों, गरीबों, निकट और दूर के पड़ोसियों के साथ भलाई करो।"

हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) ने फ़रमाया: "वह मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसकी बुराई से सुरक्षित न हो।" (सहीह बुख़ारी, हदीस 6016; सहीह मुस्लिम, हदीस 46)

यानी पड़ोसी का हक़ सिर्फ़ औपचारिक अभिवादन तक सीमित नहीं, बल्कि बीमार होने पर हालचाल लेना, भोजन साझा करना, मुश्किल में मदद करना, उनके दुख में शामिल होना और हर तरह से उनका सम्मान करना है।

इतिहास से मिसालें

  1. हज़रत जिब्रील का पड़ोसी के हक़ पर ज़ोर देना: हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) ने फ़रमाया: "जिब्रील मुझे बार-बार पड़ोसी के हक़ के बारे में ताकीद करते रहे, यहाँ तक कि मुझे लगा कि शायद वे पड़ोसी को भी विरासत में हक़दार बना देंगे।" (सहीह बुख़ारी, हदीस 6014; सहीह मुस्लिम, हदीस 2624) यह हदीस बताती है कि पड़ोसी का हक़ रिश्तेदार जैसा दर्जा रखता है।

  2. पड़ोसी को तोहफ़ा देना: एक बार हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) से पूछा गया: "अगर मेरे पास मांस का टुकड़ा हो, तो किसे दूँ?" उन्होंने फ़रमाया: "अपने उस पड़ोसी को दो जिसका दरवाज़ा तुम्हारे दरवाज़े से ज़्यादा क़रीब है।" (सहीह बुख़ारी, हदीस 2259; सहीह मुस्लिम, हदीस 2625) यह इस बात की मिसाल है कि इंसान को अपनी तवज्जोह़ सबसे पहले अपने पड़ोसी पर रखनी चाहिए।

  3. यहूदी पड़ोसी का मामला: मदीना में हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) के पड़ोस में एक यहूदी रहा करता था, जो अक्सर तकलीफ़ देता था। जब वह बीमार हुआ, तो हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) ख़ुद उसके घर हालचाल पूछने गए और उसे इस्लाम की दावत दी। (मुस्नद अहमद, हदीस 14747; सहीह, अल-अलबानी ने इसे ‘हसन’ कहा है) यह मिसाल दिखाती है कि पड़ोसी का हक़ धर्म या जाति की दीवारों से बंधा नहीं है।

  4. इस्लामी समाजों का रवैया: इस्लामी इतिहास में मोहल्ले और बस्तियाँ सामुदायिक सहयोग की बुनियाद पर खड़ी होती थीं। मस्जिद सिर्फ़ इबादतगाह नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पड़ोस की देखभाल का केंद्र थी। मदीना के बाज़ार और गली-कूचों में यह आम था कि लोग अनाथों, विधवाओं और बीमार पड़ोसियों की मदद करते।

ये शिक्षाएँ केवल धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए मानवीय नुस्ख़ा हैं। जिस दौर में अकेलापन मानसिक बीमारी और सामाजिक तनाव की सबसे बड़ी वजह बन चुका है, इस्लाम पड़ोसी के हक़ को इंसानियत की बुनियाद क़रार देता है।

मोहल्लों को फिर से जिंदा करने की ज़रूरत

गीता देवी की कहानी हमें याद दिलाती है कि इंसान ऊँची-ऊँची इमारतों में रहकर भी भीतर से खाली हो सकता है। मोहल्ला अगर टूटेगा तो इंसान का मन भी टूटेगा।

हज़रत मुहम्मद (उन पर अल्लाह की कृपा और शांति हो) की शिक्षाएँ हमें बताती हैं कि पड़ोसी का हक़ केवल रस्मी रिश्ते तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें उसकी ज़िम्मेदारी उठाना शामिल है। बीमारी, भूख, अकेलापन या तकलीफ़—इन सब में पहला सहारा पड़ोसी को होना चाहिए। यही कारण है कि जिब्रील अलैहिस्सलाम (फरिश्ता) ने बार-बार पड़ोसी के हक़ की ताकीद की।

आज जब समाज शहरीकरण और व्यक्तिवाद की गिरफ़्त में आकर रिश्तों को खो रहा है, हमें इस्लामी और मानवीय परंपराओं से सीख लेनी चाहिए। यह समय है कि हम मोहल्लों को फिर से ज़िंदा करें, अपने पड़ोसियों को परिवार की तरह अपनाएँ, और सामुदायिक मूल्यों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शामिल करें। चुनाव हमारे हाथ में है—क्या हम पड़ोसियों की पुकार को सुनकर मदद के लिए आगे बढ़ेंगे, या उन्हें बीते ज़माने की बात समझ कर उनके हाल पर छोड़ देंगे?

लेकिन एक बात तय है—अगर हमने पड़ोसियों के अधिकार और सामुदायिक मूल्यों को पुनर्जीवित न किया, तो आने वाला समाज पहले से कहीं अधिक अकेला और निष्ठुर होगा। और अगर हमने इन्हें अपनाया, तो मोहल्ले फिर से ज़िन्दा होंगे, और इंसान फिर इंसान से जुड़ेगा।


डॉ. मुहम्मद इक़बाल सिद्दीक़ी

नई दिल्ली

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