क्या हम अपने पड़ोसी के लिए फ़ायदेमंद हैं?
आज हमारी चची जान, जो हमारी रिश्तेदार हैं, हमारे घर आईं, वह बहुत नेक और समझदार महिला हैं। अल्लाह तआला ने उन्हें दीनी समझ और शऊर दिया है। वह लोगों तक दीन का पैग़ाम पहुँचाती हैं और खुद भी मज़बूत व अज़ीम किरदार की मालिक हैं। उनका अख़लाक़ (चरित्र) बहुत अच्छा है, इसलिए हम सब उन्हें बहुत पसंद करते हैं।
वो अपने बच्चों के साथ एक गाँव में रहती हैं जो शहर से लगभग 200 किलोमीटर दूर है। कहने को तो वह गाँव है लेकिन आबादी अच्छी-खासी होने के बावजूद वहाँ की सड़कें बहुत खराब हैं, बिजली और पानी की सुविधाएँ न होने की वजह से वह इलाका अब तक तरक़्क़ी नहीं कर पाया। बरसात के दिनों में पानी की निकासी न होने के कारण घरों में पानी भर जाता है। उन दिनों चची जान बहुत परेशान और उदास हो जाती थीं। इसीलिए उन्होंने तय किया था कि वे अपना मकान बेचकर शहर में आकर रहेंगी।
उन्होंने बताया कि कई महीनों से लोग उनका मकान देखने आते हैं, लेकिन न जाने क्यों बात बनते-बनते रह जाती है। मुझे भी हैरानी थी कि ऐसा क्यों हो रहा है? जबकि आस-पास के कई मकान बिक चुके हैं, तो फिर उनका मकान क्यों नहीं बिकता, जबकि वो बहुत अच्छा बना हुआ है। यही बात चची जान को उदास रखती थी और वो लगातार कोशिश करती रहती थीं कि मकान बिक जाए। हम लोग भी यही चाहते थे कि वे शहर में आकर सुकून की ज़िंदगी गुज़ारें।
लेकिन आज जब वो हमारे घर आईं, तो बहुत खुश और सुकून में लग रही थीं। उनके चेहरे पर इत्मीनान था। मुझे लगा कि शायद अब उनका मकान बिक गया है। मैंने पूछा, “चची जान, आप ठीक तो हैं?” उन्होंने कहा, “अल्हम्दुलिल्लाह, मैं बहुत ठीक हूँ।” मैं कुछ और पूछ पाती, इससे पहले ही उन्होंने कहा —“आज मैं बहुत खुश हूँ।”
मैंने कहा, “अच्छा, क्या आपका मकान बिक गया?”
उन्होंने मुस्कराकर जवाब दिया, “नहीं, मैंने अब मकान बेचने का फैसला ही छोड़ दिया है।”
मैं हैरान होकर उन्हें देखने लगी। कल तक तो वो इतनी कोशिशें कर रही थीं और अब अचानक फैसला बदल दिया — वो भी इतनी ख़ुशी से?
मैंने पूछा, “कहीं दाम कम मिल रहा था क्या?”
उन्होंने कहा, “नहीं, बल्कि इसमें अल्लाह की मर्ज़ी शामिल है।”
फिर उन्होंने बताना शुरू किया —
“एक दिन मकान के डीलर दो ख़रीदारों को लेकर आए। उन्होंने बात की और कहा कि कल लिखापढ़ी होगी, लेकिन अगले दिन वो लोग आए ही नहीं। एक हफ्ते बाद डीलर आया और बताया कि ख़रीदारों ने मकान लेने से इंकार कर दिया है। मैंने वजह पूछी, तो उसने बताने से इनकार किया। बहुत जोर देने पर उसने बताया कि आपके पड़ोसी ही आपकी रुकावट बने हुए हैं।”
ये सुनकर मैं दंग रह गई। मैं तो अपने पड़ोसियों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार करती थी फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? आख़िरकार मुझसे रहा न गया और मैं उनके घर पहुँच गई। मैंने पूछा, “आप लोगों ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? क्या मैंने कभी आपका दिल दुखाया?”
वो हँसने लगे और बोले, “आपा, बैठिए, हम बताते हैं।” मैं बैठ गई, थोड़ी देर में हमारे दूसरे पड़ोसी भी आ गए। मुझे डर लगा कि कहीं कोई झगड़ा न हो जाए, लेकिन उन्होंने बहुत प्यार से मेरा स्वागत किया, मुझे पानी और नाश्ता दिया, और बोले, “लीजिए आपा, पानी पीजिए।”
मैं गुस्से में थी लेकिन उनकी मीठी बातें सुनकर थोड़ी नरम पड़ गई। जब मैंने पानी पी लिया तो वो मुस्कराने लगे। फिर बोले, “आपा, हमें अफ़सोस है कि आपको तकलीफ़ हुई। असल में हम ही आपके मकान के बिकने में रुकावट डालते थे।” मैं हैरान रह गई।
उन्होंने कहा, “हम नहीं चाहते कि आप यहाँ से जाएँ। आप जैसी औरत की हमें बहुत ज़रूरत है। आप हमें दीन की बातें सिखाती हैं, क़ुरआन की तालीम देती हैं, जनाज़ों में ग़ुस्ल देना सिखाती हैं, हमारे बच्चों को नमाज़ और पाकी के मसले बताती हैं। आप हमारे लिए रहमत हैं आपा, अगर आप चली जाएँगी तो कौन हमें सिखाएगा?”
उन्होंने बताया कि जब भी कोई ख़रीदार आता, वो लोग उससे कहते कि इस मकान में जिन का साया है, इसलिए लोग डरकर वापस चले जाते। यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी। मैंने सोचा —कितने नेक दिल पड़ोसी हैं! अक्सर लोग बुरे पड़ोसियों से तंग आकर मकान बेच देते हैं, और यहाँ मेरे पड़ोसी हैं .... मुझे रोकने के लिए किया कुछ नहीं किया, अल्लाह उन्हें हर बुराई से बचाए और अपनी रहमतों से नवाज़े।
असल में मेरे पड़ोसी कई बार मुझसे कहते थे,“आपा, मकान मत बेचिए। जो तकलीफ़ें हैं, हम सब झेल रहे हैं। अल्लाह तआला कभी न कभी इसका हल निकाल देगा। आप ही तो कहती हैं — ‘हर मुश्किल के बाद आसानी है।’”
लेकिन मैं उनकी बातें अनसुनी कर देती थी। अब जाकर मुझे समझ आया कि ये सब अल्लाह की मर्ज़ी थी। वह जिसे जिस काम के लिए चुनता है, उसे उसी जगह रखता है। मैं खुद पर शर्मिंदा थी कि मैं अपने नफ़्स और शैतान के बहकावे में आ गई थी। मेरे पड़ोसियों ने मेरी आँखें खोल दीं और अल्लाह तआला ने मुझे सही रास्ता दिखा दिया।
जब चाची जान अपनी बात सुना चुकीं, और उनकी आँखों में पछतावे और शुक्र के आँसू थे। मैं सोच में पड़ गई क्या मैं भी अपने पड़ोसियों के लिए इतनी ही फ़ायदेमंद हूँ?
महमूदा बानो
जबलपुर, मध्य प्रदेश