दिल दीवारों के पार
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साहित्य
दिल दीवारों के पार

नई कॉलोनी में मेरा घर अभी-अभी बना था। चारों तरफ़ अजनबी चेहरे, अजनबी आवाज़ें। मैं सोचती थी, “आजकल के ज़माने में कौन पड़ोसी किसके काम आता है?”कौन किस के घर जाता है।

बस यही सोचकर मैंने तय कर लिया था कि किसी से ज़्यादा बोलचाल नहीं रखूंगी।

मेरे घर के बगल में रहती थीं फातिमा आपा — उम्र में मुझसे बड़ी, मगर दिल में समंदर-सी गहराई लिए हुए। जब भी मैं उनसे टकराती, वो हमेशा मुस्कुरा कर सलाम करतीं —

अस्सलामु अलैकुम, बेटी कैसी हो?”

मैं बस हल्का सा सिर हिलाकर निकल जाती।

वो फिर भी रोज़ दुआ देतीं, “अल्लाह तेरे घर में बरकत दे।”

और मैं मन में सोचती — “कितनी बनावटी बातें करती हैं!”

एक दिन तेज़ बारिश हुई, मेरा आंगन पानी से भर गया, बिजली भी चली गई, मैं परेशान होकर बाल्टियाँ भर-भर के पानी बाहर फेंक रही थी। अचानक पीछे से आवाज़ आई —

बेटी, अकेली क्या संभालेगी कैसे अकेले और कब तक करोगी? मैं मदद कर देती हूं।

मुड़कर देखा, फातिमा आपा थीं। उन्होंने झट से अपनी चप्पल उतारी, और मेरे साथ पानी निकालने लगीं। मैं बोली, “अरे आप क्यों तकलीफ कर रही हैं?”

वो मुस्कुराईं —

रसूलुल्लाह ने फरमाया है — ‘जो अपने पड़ोसी के साथ भलाई नहीं करता, वह मोमिन नहीं।’ बेटी, हम सब एक-दूसरे के लिए ज़िम्मेदार हैं।”

उनकी बात जैसे दिल में उतर गई। मैं चुप रही, लेकिन अंदर ही अंदर कुछ बदलने लगा था।

कुछ दिन बाद मुझे विद्यालय के किसी काम से संकुल ऑफिस जाना था और घर में बिजली का काम चल रहा था और अभी कुछ काम बाकी था जो किसी वजह से हो नहीं पा रहा था। फातिमा आपा के बेटे ने कहा, “आंटी, मैं वायरिंग ठीक कर दूँ?”

मैंने हैरानी से पूछा, “तुम्हें आता है?”

उसने बहुत नरमी से जवाब दिया जी हां!

मैंने कहा, तुम्हारा समय खराब होगा ठीक करने लग जाओगे तो

वो बोला, “जी कोई बात नहीं अम्मी कहती हैंकि पड़ोसी का काम अपना काम होता है।”

उस दिन एहसास हुआ कि इन लोगों की दुनिया कितनी सच्ची है। कितनी अच्छी इनकी सोच है और कितने अच्छे यह लोग हैं।

शाम को फातिमा आपा आईं तो बहुत सारी उनसे बातें हुई, इन्हीं बातों के दौरान एक बात के जवाब में वह बोलीं,

बेटी, अल्लाह के रसूल ने फरमाया है — ‘ वह ईमान वाला नहीं जिसने अपने पड़ोसी को अपने नुकसान से महफूज़ न रखा।’”

फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा,“हमारी दीवारें अलग हैं, लेकिन आसमान एक है, हवा एक है, और इंसानियत एक।”

मैंने सिर झुका लिया।

धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी बदलने लगी। मेरे ख्यालात बदलने लगे, दिल में सुकून सा उतरने लगा अब मैं हर सुबह सबसे पहले फातिमा आपा के दरवाज़े पर दस्तक देती,

आपकी तबीयत ठीक है ना?”

वे दरवाजा खोलतीं और धीरे से मुस्कुरा कर बोलतीं, "मैं बिल्कुल ठीक हूं" तुम फ़िक्र नहीं किया करो फिर अंदर ले जाती, फिर हम लोग थोड़ी देर बातचीत करते और उनसे बात करके मुझे बहुत अच्छा महसूस होता।

ऐसे ही एक दिन मैंने पूछा,“आपा, आप इतना अच्छा सोचती कैसे हैं?”

वो हँस पड़ीं,बेटी, ये सब मैंने अपने नबी से सीखा है। मैं हमेशा किताबें पढ़ती रहती हूं उनका जिंदगी गुजारने का तरीका क्या था, उनका व्यवहार पड़ोसियों के साथ कैसा था। उन्होंने तो यहाँ तक फरमाया — ‘जिब्रील (अलैहिस्सलाम) मुझे बार-बार पड़ोसी के हक़ की वसीयत करते रहे, यहाँ तक कि मुझे लगा कि शायद पड़ोसी को भी विरासत में हिस्सा मिलेगा।’”

मैंने गहराई से कहा, “अगर हर इंसान ये समझ ले, तो मोहल्ले जन्नत बन जाएँ।”

वो बोलीं, “बस यही तो असली जिहाद है — अपने अंदर की खुदगर्जी को मिटा देना।

उनकी अच्छी बातें सुनती तो मैं सुनती ही रह जाती, यह तो मेरा किस्सा था कि मेरे ख्यालात कैसे बदले इसी तरह मेरे ही मोहल्ले में कुलसुम खाला रहती थीं उनके बारे में बताती हूं। हमारे सामने वाले घर में कुलसूम खाला रहती थीं। वो बहुत शिकायत करने वाली और बात-बात पर नाराज़ रहने वाली थीं। किसी का बच्चा हँस दे तो भी झिड़क देतीं। रो दिए ज्यादा जिद कर तो चिड़चिड़ा जातीं। एक दिन फातिमा आपा ने उनसे भी सलाम किया और कुछ फल भेजे।

कुलसूम खाला बोलीं, “मैंने तो कभी तुम्हें अच्छा नहीं कहा, मैं तो तुमसे बात तक नहीं करती नहीं तुम्हें पसंद करती हूं फिर भी तुम मेरे घर आईं?”

फातिमा आपा मुस्कुराईं —रसूलुल्लाह ने फरमाया, ‘जो अपने रिश्तेदार या पड़ोसी से रिश्ता तोड़ता है, अल्लाह उससे अपनी रहमत दूर कर देता है।’ हम तो रहमत चाहते हैं, रंजिश नहीं।”

मैं इसीलिए आई हूं की अल्लाह ना करें कोई यह समझे की बहुत दिनों से हम दोनों की मुलाकात नहीं हो रही तो हम दोनों के दरमियान कोई लड़ाई झगड़ा या रंजिश तो नहीं ,,!?

पहले तो कुलसुम खाला को उनकी बातें अच्छी नहीं लगती थीं जैसे मेरे साथ होता था फिर धीरे-धीरे जिस तरह मेरा दिल बदलता चला गया इसी तरह कुलसुम खाला का भी दिल उनके तरफ से बदलता चला गया।

फातिमा आपा के साथ ने उनके अख़लाक और नरम व्यवहार ने कुछ ही महीनों में कुलसूम खाला को पूरी तरह बदल दिया था। अब वो रोज़ अपने घर के सामने झाड़ू लगातीं, बच्चों को प्यार करतीं, और हर किसी को मुस्कुरा कर सलाम करतीं।

कुछ महीनों बाद फातिमा आपा बीमार पड़ गईं। मैंने रात-दिन उनकी देखभाल की।

एक दिन उन्होंने मेरा हाथ थाम कर कहा,“बेटी, जब तू पहली बार यहाँ आई थी, तेरे दिल में गुस्सा ज़्यादा था। अब देख, तेरे चेहरे पर सुकून है। ये सबक पड़ोसी ने नहीं, इस्लाम ने सिखाया है।” 

मेरी आँखों से आँसू बह निकले, मैंने कहा-आपा, आपने मुझे सिर्फ़ इंसानियत नहीं सिखाई, बल्कि नबी की उम्मत बनना सिखाया।”

वो हल्की मुस्कान के साथ बोलीं,“जब इंसान अपने पड़ोसी से मोहब्बत करता है, तो अल्लाह उससे मोहब्बत करता है।”

कुछ ही दिनों बाद फातिमा आपा इस दुनिया से चली गईं। लेकिन उनके कहे हर शब्द मेरे दिल में बस गए। अब जब कोई नया परिवार मोहल्ले में आता है, मैं सबसे पहले उनके दरवाज़े पर सलाम करने जाती हूं।

अब मैं अक़्सर बच्चों से कहती हूँ -बेटा, पड़ोसी का हक़ सिर्फ़ खाना बाँटने या सलाम करने में नहीं, बल्कि दिल बाँटने में है।

रसूलुल्लाह ने फरमाया — ‘जिसने अपने पड़ोसी के साथ भलाई की, अल्लाह उसके घर में बरकत देता है।’” आज मेरा घर पहले से ज़्यादा रोशन लगता है। क्योंकि दीवारों के उस पार अब सिर्फ़ ईंटें नहीं, दिलों का रिश्ता है।

पड़ोसी का हक़ अदा करना ईमान का हिस्सा है। छोटी-छोटी नेकी बड़ी तब्दीलियाँ लाती है और जो इंसान अपने आस-पास रह रहे लोगों से मोहब्बत करता है, वो खुद अल्लाह की रहमत में आ जाता है।


यासमीन तरन्नुम "कवंल"

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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