पड़ोसियों के अधिकारः दुनिया की नेमत, आख़िरत की निजात
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इस्लाम दर्शन
पड़ोसियों के अधिकारः दुनिया की नेमत, आख़िरत की निजात

अल्लाह ने इंसान को ढेर सारी सुख सुविधाओं से नवाज़ा है, उनमें से एक बड़ी नेमत अच्छा पड़ोसी है। पड़ोसी से आशय वह व्यक्ति है जो लोगों के करीब रहता है, लोगों की ज़िंदगी के हालात से परिचित होता है और रोज़मर्रा के कामों से सबसे पहले उसके काम आता है। इस्लाम की यह खूबसूरती है कि उसने केवल अल्लाह ही नहीं बल्कि समस्त मानव जीवन के बारे में मार्गदर्शन उपलब्ध कराया है। अगर मुसलमान उन मार्गदर्शन पर चलें तो एक शांतिपूर्ण, खुशहाल और मज़बूत समाज अस्तित्व में आ सकता है। 

कुरआन में अल्लाह फरमाता हैः

करीब के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी के साथ भी भलाई करो।

मुफ्ससरीन के अनुसार करीब के पड़ोसी का मतलब है जिसका घर अपने घर से मिला हुआ हो, और दूर के पड़ोसी से आशय वह है जो मोहल्ले में रहता हो मगर फासला कुछ ज़्यादा हो। इसी प्रकार जो पड़ोसी रिश्तेदार भी हो, वह करीब का पड़ोसी है, और जो केवल पड़ोसी हो, वह दूर का पड़ोसी गिना जाएगा।

पड़ोसी के अधिकारः

इस्लाम ने पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करने को ईमान का हिस्सा करार दिया है। हज़रत अली कारी रह० ने एक हदीस के हवाले से लिखा है कि रसूल अकरम सल्ल० ने फरमायाः “क्या तुम जानते हो कि पड़ोसी का तुम पर क्या हक है? अगर वह मदद मांगे तो मदद करो, कर्ज़ चाहे तो दो, अगर मोहताज हो तो उसकी ज़रुरत पूरी करो, बीमार हो तो अयादत (देखने जाओ) करो, मर जाए तो जनाज़े में शरीक हो, खुशी हासिल हो तो मुबारकबाद दो, मुसीबत आए तो हौसला दो, उसकी इजाज़त के बिना उसके मकान से ऊंचा मकान ना बनाओ कि उसकी हवा रुक जाए, अगर फल खरीदो तो कुछ उसे भी दो, अगर ना दे सको तो अपने घर छिपाकर लाओ और अपने बच्चों को बाहर मत जाने दो ताकि पड़ोसी के बच्चों को दुख ना हो। अपनी हांडी के धुएं से उसे तकलीफ ना पहुंचाओं अगर कुछ ना कुछ उसे भी भेज दो।” आप सल्ल० ने आखिर में फरमायाः “उस ज़ात की कसम जिसके हाथ में मेरी जान है, पड़ोसी का हक वही शख़्स अदा कर सकता है जिस पर अल्लाह रहम फरमाए।” (मरक़ात अलमफ़ातिह, 69/68)

स्वाद पर प्रेम व अपनेपन को प्राथमिकताः

इस्लाम हमें यह सिखाता है कि पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव केवल माल दौलत से नहीं बल्कि लेनदेन व अच्छे बर्ताव से भी होता है। हज़रत अबुज़र रज़ि० से रिवायत है कि रसूल अक़रम सल्ल० ने फरमायाः “ऐ अबुज़र! जब सालन पकाओ तो उसका पानी ज़्यादा कर दो और अपने पड़ोसियों का ख्याल रखो।” (मुस्लिमः 2625)

मशहूर मुफस्सिर अहमद यार खान नईमी रह० कहते हैं कि इस हदीस से पता चलता है कि मामूली खाना भी पड़ोसियों को भेजते रहना चाहिए, चाहे वह सालन ही क्यों ना हो। मकसद लज़्ज़त नहीं बल्कि मोहब्बत है। क्योंकि जब सालन में सिर्फ पानी बढ़ाया जाए तो स्वाद कम होता है लेकिन मोहब्बत बढ़ती है, और यही इस्लाम का उद्देश्य है।

पड़ोसी की तरफ़ से पहुंचने वाली मुसीबत पर सब्र करनाः

पड़ोसी के अधिकार में केवल यह नहीं है कि उसे तकलीफ ना दी जाए बल्कि उसकी तरफ से पहुंचने वाली तकलीफ पर सब्र करना भी पड़ोसी के अधिकार में शामिल है। इमाम अहमद गज़ाली रह० फरमाते हैः “पड़ोसी का अधिकार केवल यह नहीं कि उसे तकलीफ ना दी जाए बल्कि यह भी है कि उसकी ओर से मिलने वाली तकलीफ पर सब्र किया जाए।” (अहया अलउलूम 267/2) नबी करीम सल्ल० ने फरमायाः “अल्लाह उन लोगों से मोहब्बत करता है जो बुरे पड़ोसियों की ओर से दी जाने वाली तकलीफ पर सब्र करते हैं, यहां तक कि अल्लाह उस से उसकी ज़िंदगी या मौत के ज़रिए आसानी फरमाए।”

पड़ोसियों को दीनी शिक्षा देनाः

इस्लाम ने हमें यह भी सिखाया है कि जहां पड़ोसी की भौतिक ज़रुरतों का ध्यान रखना ज़रुरी है, वहीं उसकी दीनी और अख़लाकी (व्यवहारिक) तरबियत करना भी ज़रुरी है। एक हदीस में नबी करीम सल्ल० ने फरमाया कि कुछ लोग अपने पड़ोसियों को दीन नहीं सिखाते, उन्हें बुराईयों से नहीं रोकते, और दीन ना सीखने के अंजाम से आगाह नहीं करते, और कुछ पड़ोसी ऐसे हैं जो दीन सीखने की कोशिश ही नहीं करते। आप सल्ल० ने फरमायाः “ख़ुदा की कसम! लोग अपने पड़ोसियों को दीन सिखाएं, उनकी रहनुमाई करें, या उनसे दीन सीखें और उस पर अमल करें।” (तिबरानी)

इस हदीस से यह स्पष्ट है कि पड़ोसी का अधिकार केवल भौतिक ज़रुरतों तक ही सीमित नहीं बल्कि शैक्षिक व व्यवहारिक मदद भी ज़रुरी है। पड़ोसियों को दीनी समझ देना, उनमें सुधार करना, और उन्हें ख़ैर की ओर बुलाना भी इस्लामी कर्तव्य है।

पड़ोसियों की हालचाल लेनाः

इसी प्रकार पड़ोसी की हालचाल लेना भी ईमान का हिस्सा है। अगर कोई कमज़ोर, बुज़ुर्ग या बीमार है, या फिर किसी के घर में कोई परेशानी है, तो उसकी मदद करना इस्लामी मेलजोल का हिस्सा है। सहाबा की ज़िंदगियों में हमें ऐसे अनगिनत किस्से मिलते हैं। हज़रत उमर फारुक़ रज़ि० कहा करते थे कि “मैंने जब भी नेकी में बाज़ी मारनी चाही तो देखा अबु बक्र रज़ि० मुझसे आगे हैं।” एक मौके पर रात के समय उमर रज़ि० एक अंधी बूढ़ी औरत के घर पहुंचे ताकि उसके काम कर दें, लेकिन देखा कि सारे काम पहले ही हो चुके हैं। अंत में पता चला कि वह ख़लीफ़ा हज़रत अबु बक्र सिद्दीक रज़ि० है जो रातों को चुपके से उस बूढ़ी औरत की सेवा करते थे। यह किस्सा सहाबा की ज़िंदगी का नहीं बल्कि इस्लाम के व्यवहार का जीता जागता नमूना है कि पड़ोसी की सेवा दरअसल अल्लाह को मनाने का ज़रिया है। (किताब अल फ़ज़ायल, बाब फज़ायल अल सहाबा)

इन किस्सों से हमें यह सबक मिलता है कि पड़ोसी का अधिकार केवल पड़ोस में रहना ही नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। हमें अपने मोहल्ले, गली और शहर में ऐसे लोगों पर नज़र रखनी चाहिए जो हमारी मदद के मोहताज हैं। कोई बीमार हो, अकेला हो, या किसी तकलीफ में हो, मुसलमान की शान है कि वह उनकी हालचाल ले, उनकी मदद करे, और उनके लिए फायदेमंद साबित हो।

नवीन सुविधाएं और रिश्तों की दूरीः

साइंस और टेक्नोलॉजी के विकास ने जहां ढेर सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, वहीं पड़ोसियों से संबंध में कमी भी पैदा कर दी है। संबंध में कमी के कई कारण हैं, उनमें से एक यह भी है कि पहले जब खाना पकाते समय किसी चीज़ की ज़रुरत पड़ती थी तो हम वह चीज़ अपने पड़ोस से ले लिया करते थे। जब हम किसी ज़रुरत की चीज़ लेने पड़ोसी के घर जाया करते थे तो केवल वह चीज़ ही लेकर वापिस नहीं आते थे बल्कि थोड़ी बहुत बातचीत हो जाती थी, उनकी हालचाल मिल जाती थी और एक रिश्ता बना रहता था। लेकिन आजकल ऑनलाइन ग्रॉसरी और “ब्लिंकइट” जैसे ऐप्स के कारण से पड़ोसियों की अब वह ज़रुरत ही बाकी नहीं रही।

जैसे जब कुलसुम ने चाय बनाने के लिए शक्कर का डिब्बा खोला तो देखा खाली है। अब चाय कैसे बनेगी? पहले यूं होता था कि हम अपने पड़ोसियों से शक्कर मांग लाया करते थे, लेकिन अब हम मोबाईल पर ब्लिंकइट के ज़रिए ऑर्डर करते हैं और वह पलक झपकते हम तक पहुंचा देता है। इस तरह पड़ोसियों पर निर्भरता कम होती जा रही है।

इसी के साथ सोशल मीडिया पर बिज़ी रहने के कारण भी हम पड़ोसियों के लिए समय नहीं निकाल पाते। यहां तक कि घर के लोगों से भी बातचीत का समय नहीं मिलता। इंसान अकेलापसंद होता जा रहा है, वह अकेला रहना पसंद करता है ताकि अपने खाली समय को सोशल मीडिया के लिए इस्तेमाल करे। उसके लिए वह प्राइवेसी चाहता है, उसे किसी की दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं। इसलिए वह अकेले रहकर सोशल मीडिया पर अपना समय बिताने लगा है।

इस्लाम ने हमें यह सिखाया है कि पड़ोसी की सेवा दुनिया के लिए भी नेमत है और आखिरत की निजात का कारण भी। जो अपने पड़ोसी के साथ भलाई करता है, वह दरअसल अपने रब की खुशी हासिल करता है। नबी करीम सल्ल० ने फरमायाः “जिब्राईल मुझे पड़ोसी के अधिकार की इतनी ताकीद करते रहे कि मैंने गुमान किया कि शायद पड़ोसी को विरासत में भी शामिल कर दिया जाएगा।” (बुख़ारी व मुस्लिम)

अल्लाह हमें हिदायत दे कि हम अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव करें, उनके दुख दर्द में शरीक हों, उनकी तकलीफ़ों को अपना समझें, उनकी दीनी व अख़लाकी तरबियत का ख्याल रखें, और एक ऐसा समाज बनाएं जहां मोहब्बत, भलाई, न्याय, सौहार्द की स्थापना हो। यही इस्लाम का संदेश है और यही निजात का रास्ता है।

अल्लाह हम सबको पड़ोसियों का हक़ अदा करने वाला बनाए। आमीन!  


अतिया सिद्दीक़ा

प्रधान संपादक, हादिया ई मैग्ज़ीन

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