पड़ोसियों के अधिकार, इस्लामिक शिक्षाओं का एक अहम पहलू
हमें स्कूलों में सिखाया जाता है की जो आपके घर के क़रीब या दाएं बाएं रहता हो वो पड़ोसी है। दीगर किसी भी मज़हब में इसकी कोई ख़ास परिभाषा नहीं है लेकिन इस्लाम में पड़ोसी का कॉन्सेप्ट क़ुरान और हदीस में बहुत ख़ूबसूरती से बताया गया है। "अल्लाह(सु.त) ने सूरह निसा आयत 36 में मां बाप, रिश्तेदारों,मोहताजों,मिस्कीनो, मुसाफिरों और गुलामो के साथ-साथ पड़ोसी रिश्तेदार,अजनबी हमसाया(पड़ोसी) और पहलू के साथियों के साथ एहसान(दयालुता) करने का हुक्म दिया है।
जब सहाबा(साथियों) ने पैगंबर मुहम्मद (ﷺ)से पूछा कि पड़ोसी कौन होते हैं, तो आपने जवाब दिया कि "इसमें आपके हर तरफ से चालीस घर शामिल हैं"। सुभानल्लाह!
क्या आपने ग़ौर किया कि यह हदीस पड़ोसी को इतनी ख़ूबसूरती से परिभाषित करती है यहां तक कि इतने बड़े क्षेत्र को कवर करती है। पड़ोसी किसी इंसान का सबसे करीबी साथी होता है। घर के सदस्यों के बाद किसी इंसान का वास्ता सबसे पहले जिन लोगों से पेश आता है वह उसके पड़ोसी हैं। अपने पड़ोसी को ख़ुश रखना और उसके साथ अच्छा रिश्ता बनाए रखना ईश्वरीय जीवन(तक़वा वाली जिंदगी) का एक अहम पहलू है।
पैगंबर मोहम्मद(ﷺ)की शिक्षाएं पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्तों की अहमियत पर ज़ोर देती हैं, और चेतावनी देती हैं कि जिस व्यक्ति का पड़ोसी उसके नुकसान से महफूज़ (सुरक्षित) नहीं है, वह सच्चा मोमिन नहीं है। आप (ﷺ) ने मोमिनो को हिदायत की- "ख़ुदा की क़सम वह मोमिन नहीं है...(तीन बार), जिसका पड़ोसी उसके शर (बुराई) से महफूज़ ना हो"-( हदीस-सही बुखारी)। इस हदीस के अनुसार कोई मुसलमान अगर अपने पड़ोसी को सताए,वह इस तरह रहे कि उसके पड़ोसी को उससे तक़लीफ़ पहुंचे, वह अपने पड़ोसी के लिए दुख का कारण बन जाए, तो ऐसे मुसलमान का ईमान और इस्लाम मुश्तबा (संदिग्ध) हो जाएगा।
पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया-"जिब्रील(अ.स) मुझे अपने पड़ोसी के प्रति हुस्ने सुलूक (दयालु रहने की सलाह) की नसीहत देते रहे, यहां तक कि मुझे लगने लगा कि वह मुझे अपने पड़ोसी को अपना वारिस (उत्तराधिकारी) बनाने का आदेश दे देंगे।"(बुखारी)। यानी हमसायों के साथ अच्छा सुलूक करने की इतनी ज़्यादा तलक़ीन (आग्रह) की गई है। एक और हदीस में अल्लाह के रसूल फरमाते हैं- "दोस्तों में सबसे अच्छा दोस्त वह है जो अपने दोस्त के लिए अच्छा हो और अल्लाह के नज़दीक पड़ोसियों में सबसे अच्छा पड़ोसी वो है जो अपने हमसाए (पड़ोसी) के लिए अच्छा हो"(हदीस-मुसनद अहमद)। जितना हमसाए के साथ अच्छा व्यवहार करने पर ज़ोर दिया गया है उतना ही उसके साथ बदसुलूकी करने का गुनाह भी ज़्यादा है।
एक और हदीस में, अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने अपने साथियों से पूछा, " तुम ज़िना (व्यभिचार) के बारे में क्या कहते हो?" उन्होंने जवाब दिया, "अल्लाह और उसके रसूल ने इसे हराम ठहराया है, इसलिए यह क़यामत के दिन तक
हराम है। अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, "अगर कोई आदमी दस औरतों के साथ ज़िना (व्यभिचार) करे, इससे कई ज़्यादा बड़ा गुनाह यह है कि वह अपने पड़ोसी की बीवी के साथ व्यभिचार करे।" फिर आप (ﷺ) ने साथियों से पूछा, चोरी के बारे में तुम क्या कहते हो?" साथियों ने जवाब दिया, चोरी हराम है, अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया, "अगर कोई आदमी दस घरों में चोरी करें इससे कई ज़्यादा बड़ा गुनाह यह है कि वह अपने पड़ोसी के घर से चोरी करें"।
पड़ोसी अपने मज़हब का हो या गैर मज़हब का, अपनी क़ौम का हो या किसी दूसरी क़ौम का, वो हर हाल में सम्मानजनक है,उसे शरिया (क़ानून) और मानवता के अनुसार सारे हक़ (अपेक्षित अधिकार) दिए जाएंगे। कुछ पड़ोसी अच्छे होते हैं और कुछ बुरे, अक्सर पड़ोसी हमारे सुख दुख के साथी होते हैं, कुछ अंदरूनी राज़ जो हम अपने रिश्तेदारों से भी छुपाना चाहते हैं लेकिन पड़ोसियों से छुपाने में नाकाम रहते हैं, इसलिए कुछ जगह वह हमारे रिश्तेदारों से भी बढ़कर होते हैं। इस्लाम आदेश देता है कि पड़ोसियों के साथ दयापूर्ण व्यवहार किया जाए ताकि वे हमारे लिए आराम और ख़ैर का बाइस (सांत्वना का स्रोत) बन जाए।
समाज को अपने पड़ोसियों के अधिकारों के प्रति जागरूक करना बहुत ज़रूरी है ताकि गरीबों की सहायता की स्थिति बनी रहे, जिससे ग़रीब और अमीर के बीच अलगाव की खाई मिटती रहे और उनके बीच सामाजिक रिश्ते क़ायम (स्थापित) होते रहे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने पड़ोसियों के अधिकारों को पूरा करने की आवश्यकता पर बहुत ज़ोर दिया, भले ही वे यहूदी ही क्यों न हों और रिश्तेदारी की तरह पड़ोसीपन में भी तरतीब (क्रम) का ध्यान रखने की हिदायत दी कि जिस पड़ोसी का दरवाजा ज़्यादा क़रीब है वह अधिक दया का हकदार है।
हज़रत आयशा(र.अ) बयां करती हैं कि मैंने अर्ज़ किया, ए अल्लाह के रसूल मेरे दो पड़ोसी हैं तो मैं उनमें से किसे तोहफ़ा भेजूं? मोहम्मद (ﷺ) ने फरमाया, जिसका दरवाज़ा तुमसे ज़्यादा क़रीब हो"(सही बुखारी)।
एक और हदीस में पैगंबर मोहम्मद (ﷺ) फरमाते हैं- " और तू अपनी हंडिया की महक से उसे (यानी पड़ोसी) तकलीफ़ ना दे सिवाय इसके कि उसमें से थोड़ा सा कुछ उसके घर भी भेज दे"(हदीस-तिबरानी)। तकलीफ ना देने से मतलब यह है कि अगर किसी के घर में कुछ अच्छा खाना पक रहा हो तो उसे कोशिश करना चाहिए कि उसकी महक हमसाए (पड़ोसी) के घर न पहुंचे, अगर वह अच्छा खाना खाने की सामर्थ्य ना रखता हो तो उसे दुख होगा, यहां तक की कोई अपने घर फल लेकर आए तो उसके छिलके बाहर इस तरह न फेंकें की उसका ग़रीब या उनके बच्चे पड़ोसी उसे देखकर दुखी हो।
आपने (ﷺ) ने फरमाया- "जब भी तुम सालन तैयार करो तो उसमें शोरबा(पानी) बढ़ा दो और अपने पड़ोसियों को भी भेजो"(हदीस-सही मुस्लिम)।
किसी आदमी की इंसानियत और उसके दीनी जज़्बे की पहली कसौटी उसका पड़ोसी है। पड़ोसी इस बात की पहचान है कि आदमी के अंदर इंसानी जज़्बा (मानवीय भावनाएं) है या नहीं और यह कि वह इस्लामी एहकाम (नियमों) के बारे में वह हस्सास (संवेदनशील) है या ग़ैर हस्सास (असंवेदनशील)। इस्लामी शिक्षाएं इस बात पर ज़ोर देती हैं कि इस बात को यकीनी (सुनिश्चित) बनाया जाए कि उसका पड़ोसी नुकसान से सुरक्षित रहे। अगर कोई उसके अधिकार उसे दे रहा है और वह उससे खुश है तो समझ लेना चाहिए कि वह सही इंसान है।
पैगंबर मोहम्मद(ﷺ) फरमाते हैं- "वो मोमिन नहीं जो पेट भर खाए जबकि उसका पड़ोसी भूखा हो"(सही बुखारी)। पड़ोसी के सिलसिले में शरीयत (क़ानून) के जो एहकाम है कि एक मोमिन को अपने पड़ोसी के साथ पक्षपात नहीं करना चाहिए और उसके सुलूक (व्यवहार) की परवाह किए बिना उसके साथ अच्छा व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए।
इस्लाम पड़ोसियों को सलाम (अभिवादन) करने, उनसे अच्छा सुलूक (व्यवहार), उनकी ख़ैर ख्वाही (भलाई), जब वे बीमार हों तो उनकी आयदत (उनसे मिलना),मुश्किल वक़्त में उन्हें हौंसला देना, भोजन बांटना, उनकी गलतियों को माफ करना, उनकी कमियों को छिपाना, इमरजेंसी (आपात स्थिति) में उनकी मदद करना, उनके माल की हिफाज़त (संपत्ति की रक्षा) करना, उन्हें परेशान न करना, तोहफे (उपहार) स्वीकार करने और फिर मुस्लिम और गैर-मुस्लिम पड़ोसियों दोनों को सबसे मूल्यवान इस्लामी शिक्षाएं प्रदान करने का आदेश देता है।
जो शख़्स भी अल्लाह और जो में यौमे आख़िरत (न्याय का दिन) पर ईमान रखता हो उसे चाहिए यह उस पर फ़र्ज़ है कि वह अपने पड़ोसी की इज्ज़त करे उसका एतराम करे। एक अच्छा पड़ोसी होना एक इंसान के अच्छे इंसान होने का सबूत है और वह अच्छा इंसान तभी बन सकता है जब उसका ताल्लुक़ अल्लाह के साथ बेहतरीन हो, क्योंकि इस्लाम सिर्फ इतना ही नहीं है कि एक मुसलमान अल्लाह का बंदा बन जाए,नमाज़ो का पाबंद बन जाए और दीगर इस्लामी एहकामो (आज्ञाओं) का पालन करें बल्कि इस्लाम यह भी है कि इंसान बंदों के साथ अच्छा सुलूक करे। अल्लाह (ईश्वर) ऐसे व्यक्ति को अपनी नेमतों का भागीदार बनाएगा।
रज़िया मसूद
भोपाल, मध्य प्रदेश