इस्लाम में पड़ोसियों के अधिकार
मनुष्य समूह में रहता है और सामूहिक रूप से शांति और समृद्धि तभी संभव हो सकती है जब लोग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हों। एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े हों, एक-दूसरे को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हों, ज़रूरत और कठिनाई में एक-दूसरे के सहायक बनते हों। समाज को मज़बूत बनाने में परिवार और शिक्षकों की भूमिका मुख्य है, उसके बाद एक मुख्य पात्र पड़ोसी है। वह व्यक्ति सौभाग्यशाली कहलाता है जिसे अच्छा पड़ोस मिला हो। अन्यथा छोटी और क्षुद्र बातों पर हर दिन बहस और विवाद होते रहते हैं। पारिवारिक लोगों के बाद अच्छे चरित्र के सबसे अधिक हक़दार हमारे पड़ोसी होते हैं।
मनुष्य जिन लोगों के बीच रहता है उनके साथ छोटे-बड़े लेन-देन चलते रहते हैं। किसी व्यक्ति की नैतिक स्थिति को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात उसका पड़ोस है। भौतिक संसाधन किसी भी समाज को सुंदरता दे सकते हैं लेकिन श्रेष्ठता और आनंद तो आपसी संबंधों में प्रेम और निष्कपटता के बिना संभव नहीं। उसमें भी पड़ोसियों के साथ संबंध की बात ही अलग है। इस्लाम ने इस रिश्ते को निभाने और मज़बूत बनाने की ज़िम्मेदारी व्यक्ति पर डाली है।
पड़ोसी के महत्व का अंदाज़ा केवल इस हदीस से लगाया जा सकता है जिसमें अल्लाह के रसूल ﷺ फरमाते हैं, जिसका भावार्थ है कि: “जिब्रील (अलै.) मुझे बार-बार पड़ोसी के हक़ के बारे में वसीयत करते रहे यहाँ तक कि मुझे लगा कि शायद उन्हें वारिस बना देंगे।” (बुख़ारी, मुस्लिम)
कुरआन पड़ोसी के हक़ के बारे में बहुत स्पष्ट और महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है। अल्लाह फ़रमाता है:
“और अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ, माता-पिता के साथ अच्छा बर्ताव करो, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ सद्व्यवहार करो, और पड़ोसी रिश्तेदारों के साथ, अजनबी पड़ोसी के साथ, पास बैठने वाले साथी के साथ, मुसाफ़िर के साथ और तुम्हारे क़ब्ज़े में रहने वालों के साथ भलाई का बर्ताव करो। निश्चय ही अल्लाह किसी घमंडी और शेख़ी बघारने वाले को पसंद नहीं करता।” (सूरह निसा-36)
इस आयत में जिन लोगों के साथ सद्व्यवहार की हिदायत दी गई है, उनमें जाने-पहचाने और अनजाने दोनों पड़ोसी शामिल हैं। अरबी भाषा में ‘जार’ शब्द का अर्थ पड़ोसी होता है। इसमें नज़दीकी, दोस्ती और सहारे जैसे भाव भी शामिल हैं। पड़ोसियों के साथ सद्व्यवहार की शिक्षा में किसी धर्म-संप्रदाय, जाति, वंश, भाषा, रंग या अन्य सामुदायिक पहचान की कोई क़ैद नहीं है। व्यक्ति चाहे किसी भी समुदाय से संबंधित हो, वह पड़ोसी के रूप में अच्छे बर्ताव का हक़दार है। और पड़ोसी के लिए नबी ﷺ ने चारों दिशाओं में 40 घरों की सीमा तय की है। सोचिए, यदि व्यक्ति इतने लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करे तो समाज कितना महक उठेगा। अब आइए देखें कि पड़ोसी के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए:
1. एक इंसान होने के नाते पड़ोसी को सम्मान देना
पद और प्रतिष्ठा इंसान के सम्मान में वृद्धि करते हैं। अल्लाह की असीम सृष्टि में असंख्य जीव हैं। अल्लाह ने जितने भी प्राणी बनाए हैं, उनमें इंसान सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित सृजन है। यही पद उसे संसार में सबसे अधिक सम्मान पात्र बनाता है। एक इंसान होने के नाते उसे केवल जीने का अधिकार ही नहीं बल्कि आदर भी मिलना चाहिए। कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
“और निश्चय ही हमने आदम की औलाद को सम्मान दिया है।” (सूरह बनी इस्राईल 70)
आज हमारे समाज की ज्वलंत समस्या यह है कि लोग एक-दूसरे को सम्मान नहीं देते और इज़्ज़त देने में बहुत चयनशील (Selective) हो गए हैं। सम्मान देने के लिए समाज ने धन-दौलत, दर्ज़ा या जाति-धर्म को मापदंड बना लिया है। जबकि इज़्ज़त इंसान का मूलभूत और जन्मजात अधिकार है। किसी भी रूप में उसका अपमान सहन नहीं किया जा सकता।
चाहे इंसान किसी भी धर्म, जाति, रंग, भाषा या सामुदायिक पहचान से संबंधित हो, फिर भी उसे इज़्ज़त मिलना चाहिए। एक इंसान के रूप में पड़ोसी को सम्मान देना हमारा मूलभूत कर्तव्य है। इसमें लापरवाही करना हमें इंसानियत के दर्ज़े से नीचे गिरा देता है।
2. एक-दूसरे के सहायक बनो
पड़ोसी केवल दीवार से जुड़ा हुआ नहीं होता बल्कि दिल से जुड़ा होना चाहिए। इंसान चाहे कितना भी धनवान क्यों न हो, लेकिन किसी न किसी कारण उसे दूसरों की छोटी-बड़ी चीज़ों की ज़रूरत पड़ ही जाती है। ऐसी स्थिति में रिश्तेदारों से पहले भी जो व्यक्ति काम आ सकता है, वह उसका पड़ोसी होता है। इसलिए पड़ोसी के साथ बहुत ही प्रेमपूर्ण संबंध होने चाहिए, ताकि जब कोई विकट परिस्थिति खड़ी हो जाए या कोई ज़रूरत सामने आए तो इंसान अपने पड़ोसी से बेझिझक कह सके। पड़ोसी की ज़रूरत को पूरा करना दूसरे पड़ोसी की ज़िम्मेदारी होती है।
अल्लाह तआला ने जिन लोगों को विनाश का पात्र बताया है, उनमें वे लोग भी शामिल हैं जो छोटी-छोटी आवश्यक वस्तुएँ एक-दूसरे को नहीं देते। अल्लाह फ़रमाता है:
“फिर विनाश है उन नमाज़ पढ़ने वालों के लिए, जो अपनी नमाज़ से गाफिल रहते हैं, जो दिखावा करते हैं और मामूली ज़रूरी चीज़ें (लोगों को) देने से बचते हैं।” (सूरह माऊन 4-7)
मौलाना मौदूदी रह० तफ़हीमुल कुरआन में लिखते हैं:
“अधिकांश मुफ़स्सिरों का मानना है कि ‘माऊन’ उन सभी छोटी-छोटी चीज़ों पर लागू होता है, जिन्हें आमतौर पर पड़ोसी एक-दूसरे से माँगते रहते हैं। उनका माँगना कोई अपमान की बात नहीं होती, क्योंकि गरीब और अमीर दोनों को कभी न कभी इनकी आवश्यकता पड़ती ही रहती है। लेकिन, ऐसी वस्तुएँ देने में कंजूसी करना नैतिक दृष्टि से नीच और हल्के प्रकार का कृत्य समझा जाता है। सामान्य तौर पर ऐसी वस्तुएँ सुरक्षित रहती हैं और पड़ोसी उनका इस्तेमाल करके यथावत वापस लौटा देते हैं।
इसी ‘माऊन’ के अर्थ में यह भी आता है कि किसी के यहाँ मेहमान आ जाएँ और वह पड़ोसी से खाट या बिस्तर माँग ले, या कोई अपने पड़ोसी के चूल्हे में अपनी रोटी सेंकने की माँग करे, या कोई कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हो और सुरक्षा की दृष्टि से अपना कोई कीमती सामान पड़ोसी के पास रखना चाहे। इस प्रकार आयत का उद्देश्य यह बताना है कि आख़िरत का इनकार इंसान को इतना संकुचित मन का बना देता है कि वह दूसरों के लिए किसी मामूली त्याग के लिए भी तैयार नहीं होता।”
3. भेंट और तोहफ़े देना
जीवन को आनंदमय बनाने के लिए पड़ोसी के साथ संबंधों में सामंजस्य होना बहुत ज़रूरी है। भेंट देने के लिए बड़ी या महँगी वस्तुओं अथवा विशेष अवसरों की आवश्यकता नहीं होती। छोटी-छोटी चीज़ें भी दी जा सकती हैं। अगर कुछ और न हो तो जो भोजन पकाया गया है, वही भेजा जा सकता है या फिर घर पर भोजन के लिए बुलाया जा सकता है। अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया:
“आपस में तोहफ़े दो, क्योंकि इससे आपसी प्रेम बढ़ता है।” (मुस्नद अहमद)
एक बार हज़रत आयशा रज़ि० ने पूछा: “या रसूलल्लाह (ﷺ)! मेरे दो पड़ोसी हैं, तो मैं किसे तोहफ़ा भेजूँ?” तो आप (ﷺ) ने फ़रमाया:
“जिसका दरवाज़ा तुम्हारे दरवाज़े से अधिक क़रीब हो।” (सहीह बुख़ारी 2259)
4. सुख–दुःख में साथ देना
अगर पड़ोसी बीमार हो तो उसकी ख़ैर-ख़बर लेनी चाहिए। आवश्यकता हो तो उसे अस्पताल ले जाने या दवा-दारू की व्यवस्था करने में मदद करनी चाहिए। अगर वह किसी परेशानी में हो तो उसे मार्गदर्शन देना, उसकी काउंसलिंग करना या किसी प्रकार की सहायता की ज़रूरत हो तो मदद करनी चाहिए। उसके यहाँ ख़ुशी का कोई अवसर हो तो उसे शुभकामनाएँ देनी चाहिए और उस अवसर में शामिल होना चाहिए।
सुख-दुःख में साथ देने से इंसान भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है और चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ हों, वह आशा नहीं छोड़ता। आजकल लोग परिवार-केंद्रित हो गए हैं, इसलिए उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं रहती कि पड़ोसी के यहाँ क्या चल रहा है, न ही वे कोई मदद करते हैं। बल्कि अगर पड़ोसी ज़रूरतमंद हो तो कुछ लोग उससे बात करने में भी संकोच करते हैं। जबकि अगर पड़ोसी ग़रीब या ज़रूरतमंद हो तो उसकी विशेष देखभाल करनी चाहिए। एक पड़ोसी होने के नाते यह हमारा कर्तव्य है, क्योंकि सबसे नज़दीकी व्यक्ति हमारे अच्छे आचरण का सबसे अधिक हक़दार होता है। अल्लाह क़ुरआन में फ़रमाता है;
“(सदाचारी लोग) अल्लाह की मोहब्बत में ग़रीबों, यतीमों और क़ैदियों को भोजन कराते हैं। (और वे कहते हैं:) हम तुम्हें केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए भोजन कराते हैं, हम तुमसे न कोई बदला चाहते हैं और न ही तुम्हारी ओर से कोई शुक्रिया।”
5. रहस्य और निजता बनाए रखना
यह हकीकत है कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी की छोटी-बड़ी कमियों या खूबियों से वाक़िफ होता है। लोगों की खूबियों का वर्णन करने से रिश्तों में मिठास पैदा होती है, लेकिन उनकी कमियाँ उजागर करने से संबंधों में कड़वाहट पैदा हो जाती है। अगर हम उनके बारे में कोई निजी या गुप्त बात जानते हों, तो उसे सुरक्षित रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। कुरआन की शिक्षा ही यह है कि कोई दूसरे की जासूसी (रहस्य खोजने) न करे:
“और तुम एक-दूसरे की जासूसी न करो।” (सूरह हुजुरात 12)
और अगर कोई बात मालूम हो जाए तो उसे सुरक्षित रखना भी हमारी ज़िम्मेदारी है। क्योंकि वो एक अमानत है। अल्लाह फ़रमाता है:
“और जानते-बूझते अपनी अमानतों में ख़ियानत (धोखा) न करो।” (सूरह अन्फाल 27)
6. घर–मकान और परिवार की देखरेख करना
ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं कि कभी पड़ोसी को घर बंद करके या बच्चों को छोड़कर बाहर जाना पड़े। ऐसी स्थिति में उनके घर की देखरेख करनी चाहिए। कभी ऐसा भी होता है कि उन्हें लंबे समय के लिए शहर छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसे हालात में एक अच्छे पड़ोसी के रूप में उनके घर और माल-मकान की हिफ़ाज़त करना हमारी ज़िम्मेदारी बनती है। पड़ोसी के साथ इतने गहरे और निष्कपट संबंध होने चाहिए कि वह हम पर भरोसा कर सके।
7. अपनी वाणी और आचरण से तकलीफ़ न पहुँचाओ
कुरआन में एक ऐसी औरत का उल्लेख है जो नबी ﷺ को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए उनके रास्ते में काँटे, लकड़ियाँ और गंदगी फेंकती थी। अपने शब्दों और साज़िशों से वह लगातार हज़रत मुहम्मद ﷺ का उपहास करती और लोगों को भड़काती थी। यह औरत आपकी (ﷺ) चाची थी जो आपके पड़ोस में ही रहती थी। पड़ोसी को तकलीफ़ पहुँचाना इतना बड़ा गुनाह है कि सूरह लहब में अबू लहब के साथ उसकी पत्नी उम्मे जमील को भी जहन्नम की ख़बर सुनाई गई:
“निश्चय ही उसे भड़कती आग में डाला जाएगा। और (उसके साथ) उसकी पत्नी भी, लकड़ियाँ ढोने वाली, जिसके गले में मुँज की रस्सी होगी।” (सूरह लहब 3-5)
इसलिए मोमिन को शोभा नहीं देता कि वह अपनी वाणी या आचरण से अपने पड़ोसी को तकलीफ़ पहुँचाए। जैसे, अपने घर में ऊँची आवाज़ में बातें करना या गाने बजाना जिससे पड़ोसी को शोर-गुल महसूस हो, घर का कचरा बगल के ओटले (बरामदे) में फेंक देना, अपने घर का पानी इस तरह बहाना कि वह पड़ोसी के दरवाज़े के आगे जाए, उसे ताने मारना, उससे ईर्ष्या करना या उस पर झूठा शक करना आदि। ये सभी ऐसे काम हैं जिनसे पड़ोसी को तकलीफ़ पहुँचती है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:
“झूठे शक से बचो, क्योंकि शक की बहुत-सी बातें झूठी होती हैं। लोगों की कमियाँ तलाश करने में मत लगो, आपस में ईर्ष्या मत करो, एक-दूसरे की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) मत करो, आपस में दुश्मनी मत रखो; बल्कि तुम सब अल्लाह के बन्दे होकर आपस में भाई-भाई बनकर रहो।” (बुख़ारी 6064)
8. विवाद के बीच न्याय
मानव समाज अनेक स्वभावों, आदतों और विचारों का संगम है। उनके बीच कभी-कभी मतभेद होना बिल्कुल स्वाभाविक है। जब लोग साथ रहते हैं और दो घरों की दीवारें भी एक होती हैं, तो छोटी-सी बात पर भी विवाद होने की संभावना रहती है। किसी भी विवाद में एक व्यक्ति की वाणी या आचरण गलत होना निश्चित है, लेकिन जब बात करने में पक्षपात किया जाता है, तो छोटा-सा मुद्दा भी एक बड़ी समस्या बन जाता है। इसलिए अल्लाह किसी भी परिस्थिति में न्याय की तुला को बिगाड़ने से रोकता है।
“और जब तुम बोलो, तो न्याय की बात करो, चाहे वह तुम्हारे रिश्तेदार के ही विरुद्ध क्यों न हो।” (सूरा अनआम 6:152)
पड़ोसी के अधिकारों के बारे में हज़रत मुहम्मद स.अ.व. ने बहुत कुछ कहा है, जिसे हमें हमेशा सामने रखना चाहिए। पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार से अल्लाह खुश होकर हमें जन्नत में स्थान देगा। अल्लाह के नबी स.अ.व. फरमाते हैं:
“जो कोई हलाल कमाई करता है ताकि भीख मांगने से बचे, अपने परिवार के लिए कुछ कमाए और अपने पड़ोसियों के साथ दयालु व्यवहार करे, वह क़यामत के दिन चमकते चाँद की तरह दमकता हुआ चेहरा लेकर आएगा।” (मिशकात 5207)
तो आइए! लें सीरत का ज्ञान, रखें पड़ोसी का ध्यान।
शकील अहमद राजपूत
स्वतंत्र लेखक, गुजरात