कैसे बनें मेट्रो कल्चर में पड़ोसियों के साथ संबंध?
बीसवी सदी में विकास की तीव्र गति ने गांव और शहरों की दशा ही बदल कर रख दी। मानव आबादी का गांवों से शहरों और शहरों से मेट्रो शहरों की ओर तेज़ी से स्थानांतरण होने लगा। देखते ही देखते कल तक जो शहर थे आज बड़े शहर (बिग सिटीज़) और जो बड़े शहर थे वे मेट्रो सिटीज़ की श्रेणी में गिने जाने लगे। मेट्रो शहर औद्योगिक और व्यापारिक विकास के साधन और लोगों के लिए रोजगार के अवसर होने के कारण वर्तमान समय में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
इसके साथ ही तकनीक, आर्थिक गतिविधियां और बुनियादी ढांचे की प्रचुरता, शैक्षिक अवसर जैसे कारणों ने ग्रामीण और शहरी आबादियों को मेट्रो सिटीज़ में स्थानांतरण के रुझान में दिन-ब-दिन वृद्धि कर डाली। यूं तो एक ओर इस रुझान ने लोगों की लाइफस्टाइल बदली वहीं दूसरी ओर अनेकों समस्याओं ने जन्म लिया जिसमें से एक बड़ी समस्या अकेलेपन की है।
घनी आबादी, आवासीय मकानों में जगह की कमी, तेज़ जीवन की व्यस्तताएं, नौकरी की जगह तक पहुंचने के लिए कई-कई घंटों की दैनिक यात्रा, विभिन्न क्षेत्रों से प्रवास करके शहरों में स्थानांतरण के कारण एक-दूसरे से अजनबीपन ने उदासीनता की संभावनाएं बढ़ा दी हैं। मेट्रो शहरों में पड़ोसियों में जहां भौतिक निकटता बढ़ी है, दरवाजों और घरों की दूरियां घट गई हैं, वहीं यह निकटता रिश्तों में विलुप्त होती चली गई। यूं तो कहने को एक-एक अपार्टमेंट में एक-एक मोहल्ला समाता जा रहा है लेकिन दिलों की दूरियां लगातार बढ़ती ही जा रही हैं।
खुशहाली के सपने की ताबीर
मेट्रो शहरी जीवन की अपनी समस्याएं हैं। एक बेहतर जीवन का सपना आंखों में सजाकर शहर का रुख करने वाले लोग जहां अपनों से दूर होते हैं, वहीं नए शहर, अजनबीपन का एहसास और व्यस्त जीवन के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाते हैं। यह स्थिति उस समय और अधिक भयावह महसूस होती है जब कोई अचानक गंभीर हालात का शिकार होता है और कोई हालचाल पूछने वाला नहीं होता।
यह आंखों देखी वास्तविकता है कि अक्सर पड़ोसी के दरवाजे पर जनाज़ा देखकर लोगों को पड़ोस में हुई मौत का पता चलता है। सवाल यह पैदा होता है कि क्या यही वह जीवन है जिसका सपना सजाए लोग शहर और शहर से मेट्रो शहर में स्थानांतरण का सफर जारी रखे हुए हैं? इसका जवाब निश्चित रूप से नहीं में ही होगा। क्योंकि लोग आर्थिक उन्नति का सपना जरूर देखते हैं, लेकिन इसकी व्याख्या में मानवीय रिश्तों से रिक्त होकर अकेलेपन का शिकार होने का विचार नहीं था। शहरी जीवन में प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, समस्याओं और व्यस्तताओं की भरमार मानवीय रिश्तों को प्रभावित करने लगती है और यदि भौतिकवाद का प्रभुत्व हो तो ये रिश्ते गौण दर्जा अपना लेते हैं।
शाइस्ता रफ़अत
जनरल सेक्रेटरी, द वूमेन एजुकेशन एंड इम्पॉवरमेंट ट्रस्ट, नई दिल्ली