पड़ोसी के अधिकार: सामाजिक सद्भाव का आधार
हमारे आसपास जो लोग रहते हैं, वे केवल मकान या चेहरों का समूह नहीं, बल्कि हमारे जीवन का अटूट अंग हैं। जब कोई दुखी होता है, बीमार पड़ता है या किसी परेशानी में होता है, तो सबसे पहले दरवाज़ा खटखटाने वाला पड़ोसी ही होता है। और जब खुशी का मौक़ा आता है, तो वही चेहरा हमारे आँगन की रौनक बन जाता है।
लेकिन आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने इस रिश्ते की मिठास को कहीं पीछे छोड़ दिया है। दीवारें ऊँची होती चली गईं और दिलों के दरवाज़े बंद हो गए। ऐसे समय में, जब समाज में आत्मकेंद्रिता बढ़ रही है, इस्लाम की पड़ोस संबंधी शिक्षाएं हमें फिर से इंसानियत और सामाजिक सौहार्द की ओर लौटने का निमंत्रण देती हैं।
धार्मिक व नैतिक बुनियाद
इस्लाम में पड़ोसी के अधिकारों को असाधारण महत्व प्राप्त है। क़ुरआन मजीद की सूरह अन-निसा (4:36) में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को शरीक न करो, और माता-पिता, रिश्तेदारों, यतीमों, मिस्कीनों, क़रीबी पड़ोसियों, दूर के पड़ोसियों, साथियों और मुसाफ़िरों के साथ भलाई करो।”
यह आयत स्पष्ट करती है कि इबादत केवल मस्जिद या नमाज़ तक सीमित नहीं, बल्कि पड़ोस के साथ भलाई करने में भी शामिल है। इस्लाम इंसान की आध्यात्मिकता को सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ देता है।
इबादत और इंसानियत का यह संगम बताता है कि एक इंसान का चरित्र तब तक मुकम्मल नहीं हो सकता जब तक वह अपने पड़ोस के लोगों के साथ न्याय, करुणा और सहानुभूति का व्यवहार न करे।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की शिक्षाएं
रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने जीवन में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि पड़ोस के लोगों के साथ भलाई करना ईमान और इंसानियत की पहचान है।
हदीस में आता है कि जिब्रील (फ़रिश्ता) इतने बार पड़ोसी के हक़ के बारे में हिदायतें लेकर आते रहे कि पैग़म्बर ﷺ को यह आशंका हुई कि कहीं पड़ोसी को विरासत में हिस्सा न दे दिया जाए।
यह शिक्षा हमें यह एहसास कराती है कि पड़ोसी का अधिकार केवल सामाजिक मर्यादा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज़िम्मेदारी भी है।
क़ाज़िया अंसारी सालेहाती
अहमदाबाद, गुजरात