पड़ोसियों से रिश्ते मधुर करना समय की बड़ी ज़रुरत
हमारी गौरवशाली भारतीय संस्कृति का यह इतिहास रहा है कि यहां सदियों से अनेकता में एकता का संगम मौजूद था। समाज में लोगों के बीच भले ही कितनी विविधताएं पायी जाएं लेकिन फिर भी पूरा सामाजिक ताना-बाना ऐसा था कि हर कोई एक दूसरे के सहयोग के लिए खड़ा रहता था। लेकिन फिर धीरे धीरे यह खूबी विलुप्त होना शुरु हो गई और आज समाज में ऩफ़रत ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि हम सब एक दूसरे से कटते चले जा रहे हैं। यहां तक कि हमें यह नहीं पता होता कि जिस घर में पिछले दस बीस सालों से हम रहे हैं उसके ठीक बगल में रहने वाले व्यक्ति का नाम क्या है।
लोगों के बीच विशेषरुप से पड़ोसियों के बीच बढ़ती इस ख़ाई को पाटने के लिए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद द्वारा एक देशव्यापी अभियान “पड़ोसियों के अधिकार” चलाया जा रहा है। जिसका उद्देश्य पड़ोसियों के बीच रिश्तों को मधुर करना, मुसलमानों को अपने दायित्व और अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाना, पड़ोसियों के अधिकारों के सिलसिले में इस्लामी शिक्षाएं देशबंधुओं के समक्ष प्रस्तुत करना, भाईचारे को मज़बूत करना, उन खामियों और कमज़ोरियों को दूर करना जिसकी वजह से दूसरों के अधिकारों को ठेस पहुंचती है, उन्हें दूर करना और एक आदर्श समाज बनाने के लिए कोशिश करना शामिल है।
पहले जहां शाम को आंगन में बैठ सब एक दूसरे से हंसी ठिठोली करते थे, जहां एक आदमी जब मदद के लिए पुकारता तो दसों लोग उसकी मदद को पहुंच जाते जाते थे, जहां बचपन रंगों से भरा था, जहां बुढ़ापा भी खूबसूरत हुआ करता था, वो सब अब कहीं खो गए है। एक रंगीन शाम और खिलखिलाती सुबह की जगह भागदौड़ की जिंदगी ने ले ली और रही सही कसर मोबाइल फोन्स ने पूरी कर दी। इंसान स्क्रीन की दुनिया में इतना व्यस्त हो गया कि उसे अपने घर ही में बीवी, बच्चों और मां - बाप से बात करने की फुर्सत नहीं है, ना अपने आसपास के लोगों से मिलने जुलने का समय है।
लोगों में एक दूसरे के प्रति बढ़ती नफरतें, दूरियां, हसद और मोहब्बत की कमी ने इंसान को बहुत खुदगर्ज बना दिया है। जिस कारण समाज में रिश्तेदारों, पड़ोसियों और साथ वालों के लिए सम्मान, मोहब्बत, न्याय और उनके अधिकारों से लोग बेपरवाह हो गए। हाल ये है कि हर व्यक्ति अकेलापन चाहता है ना उसे अपने रिश्तेदारों के दुःख दर्द का अहसास है ना ही अपने पड़ोसियों का।
एक रिपोर्ट के मुताबिक बड़े शहरों में इमारतों में रहने वाले लोग अपने पड़ोसियों के नाम तक से परिचित नहीं है। शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित रोग, अप्रत्यक्ष रूप से ये आपसी मेलजोल की कमी की वजह से बढ़ रहे है। पड़ोसी सिर्फ अपने घर के पास वाला घर ही नहीं है बल्कि हर वो व्यक्ति है जो आपके साथ काम कर रहा है
या आपका रिश्तेदार जो आपके साथ घर में रहता हो या सहयात्री, हर एक के कुछ न कुछ अधिकार है जिन्हें पूरा करना हमारा कर्तव्य है।
आज एक ही घर में रहने वाले लोगों के दिल एक दूसरे से मिले हुए नहीं है, साथ में रहते हुए एक दूसरे की मदद ना करना, बीमार पड़ने पर साथ वाले का हाल तक ना पूछना, अपनी जरूरतें पूरी करना और साथ रहने वालों की चीजों का ज़रा भी ख़्याल न रखना, पानी के लिए भी आपस में झगड़ा करना और लेने देने से इनकार करना, छोटी छोटी ज़रूरत की चीजों को इस्तेमाल के लिए देने से मना करना, दूसरों के ऐबो के उछालना, बेसहारों की मदद ना करना, बड़े घरों में साथ के पड़ोसी या घर के बाहर के गरीब पड़ोसियों की देखभाल ना करना, ये सब हमारे समाज में इतना आम हो गया है कि लोग इसे गलत ही नहीं समझते।
जबकि इस्लाम एक आदर्श समाज के निर्माण की शिक्षा पेश करता है। जहां लोग मिलजुल कर रहते होगे, एक दूसरे के सुख दुख में साथ देने वाले होंगे तो निसंदेह वो समाज भी अच्छा होगा। इस्लाम ये शिक्षा देता है कि अपने पड़ोसियों के साथ श्रेष्ठ व्यवहार करो,गरीब पड़ोसी और रिश्तेदारों की देखभाल करो।
नबी ﷺ ने फरमाया:
''वह शख़्स मोमिन नहीं हो सकता, जो (ख़ुद तो) पेट भरकर खाता हो, जबकि उसका पड़ोसी भूखा हो।''
पड़ोसियों के बारे में ये ख्याल रखे कि हमारी वजह से उनको कोई तकलीफ ना पहुंचे, कचरा दूसरों के घरों के सामने डालना, लड़ाई झगड़ा और गाली गलौज करने से भी नबी ﷺ ने मना फरमाया है।
अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया : "जो कोई अल्लाह और आख़िरत के दिन पर इमांन रखता है वो अपने पडोसी को तकलीफ ना पहुंचाए।"
अगर एक आदर्श समाज हम चाहते है जहां लोग एक दूसरे के दुःख दर्द में काम आए, जहां लोग अपने साथ वालो की परेशानी को दूर करने वाले बने, जहां बच्चों का बचपन मोहल्ले और कॉलोनी के बड़े बुजुर्गों के मोहब्बत के साए में गुजरे, जहां छोटे बड़ों की इज्ज़त करे, जहां समाज के धनवान और संपन्न लोग अपने निर्धन पड़ोसी के साथ नर्मी और भलाई करने वाले हो। ऐसा समाज तभी संभव है जब हम स्वयं को बदलने की कोशिश करे, हर व्यक्ति अपने साथ रहने वाले रिश्तेदारों, अपने घर के करीब पड़ोसी, अपने सहयात्री और अपने साथ काम करने वाले के साथ अच्छा व्यवहार करे।
ऐसे समाज का निर्माण करने की हम कोशिश करे जहां हमारे रिश्तेदार, पड़ोसी और साथ वाले बेझिझक अपनी परेशानी बताए और हम उसे दूर करने की कोशिश करे, हमारे मेलजोल लोगो के साथ बढ़ाए ताकि एक खूबसूरत बातचीत हर रोज़ या हर सप्ताह हमारे बीच आम हो जाए, हम लोगों के लिए ख़ैर बनकर रहे, हमारी वजह से किसी तकलीफ़ ना हो और हमारा वजूद लोगो के लिए रहमत का बाइस हो। तभी हम एक सुंदर और अच्छे समाज का निर्माण कर पाएंगे।
ख़ान शाहीन
संपादक